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हे प्रभु... आखिर कब तक ऐसी पटरियों पर दौड़ेगी ट्रेन?

मैं जानता हूँ कई आलोचक एवं बुद्धिजीवी लोग अपने-अपने तर्क रख रहे हैं, मगर सवाल हमेशा की तरह वही है। हम हमेशा ठोकर खाकर ही क्यों संभलते हैं? या यह कहूँ संभलने का नाटक करते हैं। क्योंकि अगर सच-मुच जिम्मेदार इन घटनाओं को गंभीरता से लेते तो देश में रेल दुर्घटना की इतनी संख्या नहीं बढ़ती।

एक तरफ जहाँ देश बुलेट ट्रेन आने के सपने देख रहा है वहीं दूसरी तरफ ऐसे हादसे सवा सौ करोड़ भारतीयों के सपनों को तोड़ने के लिए काफी है। हमेशा की तरह पटना-इंदौर ट्रेन में हुए हादसे पर भी कई जाँच कमेटी बैठेगी और अगली जाँच तक के लिए यह स्थगित कर दी जाएगी। फिर सालों बाद इस जाँच की फाइल किसी सरकारी दफ्तर में धूल खाती हुई मिलेगी और जब तक अगली दुर्घटना नहीं हो जाती, इस जांच की किसी को याद नहीं आएगी। हर बार यही होता है, और इस बार भी यक़ीनन यही होगा। आइये जानते हैं क्या चूक होती है हमसे।

हे प्रभु... आखिर कब तक ऐसी पटरियों पर दौड़ेगी ट्रेन?

हे प्रभु... आखिर कब तक ऐसी पटरियों पर दौड़ेगी ट्रेन?

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अब तक 142 लोगों की मौत हो चुकी है 

अब तक 142 लोगों की मौत हो चुकी है 

रविवार को हुए पटना-इंदौर ट्रेन हादसे में अब तक 142 लोगों की मौत हो चुकी है।  सरकार हादसे की जांच फोरेंसिक जांच करवाने का आश्वासन दे रही है। मगर हम सब जानते हैं, हमारे देश में जाँच किस स्तर पर होती है और किस परिणाम पर ख़त्म होती है। अगर जाँच से ही सब कुछ ठीक हो जाता तो हामरे देश में कभी कोई तकलीफ होती ही नहीं।       

पटरी में दरार की आशंका 

पटरी में दरार की आशंका 

जानकारों के अनुसार यह दुर्घटना रेलवे पटरी में दरार की वजह से आई है। दरअसल ठण्ड के मोसम में रेलवे पटरियां सिकुड़ कर सख्त हो जाती है। और जब उस पर कोई भारी ट्रेन गुजरती है तो वह फट जाती है। क्या इस बात की जानकारी वहाँ के जानकारों को नहीं थी। क्या पेट्रोलिंग टीम ने अपनी जिम्मदारी अच्छे से नहीं निभाई थी? 

अल्ट्रा सोनिक वाल डिटेक्शन टेस्ट 

अल्ट्रा सोनिक वाल डिटेक्शन टेस्ट 

रेलवे के अनुसार हर मेन लाइन जो ट्रेक रूट पर है जैसे दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-कोलकाता, दिल्ली-चेन्नई, कोलकाता-मुंबई, इन पर अल्ट्रासोनिक वॉल डिटेक्शन टेस्ट होता है। इस आधुनिक उपकरण में ट्रेनों के चलने से ट्रेक पर जितना भी डैमेज हुआ है उसका पता चल जाता है। साथ ही साथ ट्रेन के चलने से पटरियों पर जो छोटे-मोटे क्रेक होते हैं वे भी इस मशीन से नज़र में आ जाते हैं।

कब हुआ था इंदौर-पटना रेलवे लाइन का अल्ट्रा सोनिक वॉल डिटेक्शन टेस्ट 

कब हुआ था इंदौर-पटना रेलवे लाइन का अल्ट्रा सोनिक वॉल डिटेक्शन टेस्ट 

रेलवे के अनुसार जो मेन लाइन है उनका अल्ट्रा सोनिक वाल डिटेक्शन टेस्ट एक महीने में होता है तथा बाकी की लाइनों का टेस्ट 1-2 महीनें के अन्तराल में होता है। ऐसे में इंदौर पटना ट्रेक का अल्ट्रा सोनिक वाल डिटेक्शन टेस्ट कब हुआ था? अगर नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? और अगर हुआ तो उसमें यह डैमेज क्यों नहीं दिखा? क्या बाकी के ट्रेक का सही समय पर टेस्ट हो रहा है? यह वह सवाल है जो आज हर भारतीय के मन में चल रहे होंगे।

ड्राइवर ने भी अपनी रिपोर्ट में लार्चिंग को ही कसूरवार ठहराया 

ड्राइवर ने भी अपनी रिपोर्ट में लार्चिंग को ही कसूरवार ठहराया 

दरअसल ऐसे हादसे जिसमें ड्राइवर को गाड़ी के नीचे गढ्ढा सा महसूस होता है तो ऐसे हादसों को लार्चिंग कहते हैं। अब जब ट्रेन के ड्राइवर ने अपनी रिपोर्ट में भी लार्चिंग को ही कसूरवार ठहराया है, तो इससे एक बात तो साबित हो ही जाती है कि पटरियां सुरक्षित नही हैं। ऐसे में इस हादसे की वजह लापरवाही नहीं है तो और क्या है?   

क्षमता से ज्यादा वजन 

क्षमता से ज्यादा वजन 

आमतौर पर देखा जाता है कि भारतीय रेल अपनी क्षमता से ज्यादा वजन उठाती है। सिर्फ यात्री गाड़ियों का ही यह हाल नहीं है, बल्कि माल गाड़ियों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। क्षमता से अधिक वजन उठाने की वजह से भी पटरियां टूटने लगती है। भारतीय रेलवे को इस विषय पर भी नज़र रखने की आवश्यकता है।

बार-बार गलती कर के भी हम क्यों नहीं संभलते 

बार-बार गलती कर के भी हम क्यों नहीं संभलते 

ऐसा नहीं है की पहली बार कोई हादसा हुआ हो, कई सालों से ऐसे हादसे होते आ रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हर साल भारत में 300 छोटे-बड़े रेल हादसे होते हैं। जिसमें कई लोगों की जान चली जाती है। तो आखिर हम कब सीखेंगे, कब संभलेंगे? ज़ाहिर सी बात है, ऐसी पटरियों पर तो बुलेट ट्रेन नहीं दौड़ सकती। या तो हम सपना देखना छोड़ दें या ज़िम्मेदार लोग जिम्मेदारी लेना शुरू कर दें। 

क्या आपको लगता है कि भारतीय रेलवे विभाग सुरक्षा के मामलों में काफी लापरवाही बरतता है?

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