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रॉक ऑन 2 मूवी रिव्यू: यह सिर्फ एक बैंड की कहानी नहीं है! 

आज रॉक ऑन मूवी देखने जाना था, सच मुच काफी उत्सुक था मैं। क्योंकि फरहान खान के करोड़ों चाहने वालों में से एक हूँ, और दूसरा कारण यह भी था कि रॉक ऑन 1 ने मेरे दिल पर काफी गहरा असर किया था तो कुल-मिला कर उत्सुकता मेरी चरम पर थी। यह तो पता था फरहान परदे पर आग लगा देगा, असल में तो देखना यह था अर्जुन, श्रद्धा, पूरब और प्राची फरहान का कितना साथ देते हैं। सुबह जल्दी उठा, फ्रेश होकर थिएटर की ओर चल दिया। फिल्म शुरू हो गई, पहला हाफ मैं मूवी रिव्यू के हिसाब से देख रहा था। मगर दूसरे हाफ में...  

रॉक ऑन 2 मूवी रिव्यू: यह सिर्फ एक बैंड की कहानी नहीं है! 

रॉक ऑन 2 मूवी रिव्यू: यह सिर्फ एक बैंड की कहानी नहीं है! 

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दमदार है फिल्म की कहानी 

दमदार है फिल्म की कहानी 

कहानी शुरू होती है फरहान से, फरहान अपना सब कुछ छोड़ कर दार्जिलिंग के एक गाँव में अपना फार्म हाउस बना लेता है। अर्जुन, पूरब, साक्षी और उसका बेटा फरहान के फार्म हाउस में फरहान का बर्थ डे मनाने जाते हैं। साथ ही वे फरहान को मुंबई आने के लिए भी मनाते हैं, मगर वह नहीं मानता। एक दिन अचानक गाँव में आग लग जाती है जिसमें सब कुछ जल जाता है। फरहान इससे टूट जाता है और पूरब उसे फिर बॉम्बे ले आता है।

मुम्बई आने के कुछ दिन बाद फरहान को उसके गाँव से फोन आता है कि यहाँ लोगों के हालात बहुत बुरे हो गए हैं, यह सुनकर फरहान सब कुछ छोड़ वापस गाँव चले जाता है। यहाँ गाँव की हालत सुधारने के लिए वे एक शो करते हैं जिसे करने में उन्हें कई तकलीफों का सामना करना पड़ता है।

स्क्रीन प्ले पर था फिल्म का पूरा दारोमदार 

स्क्रीन प्ले पर था फिल्म का पूरा दारोमदार 

स्क्रीन प्ले अच्छा है। फिल्म में घटी हर घटना सच का आभास कराती है। इस फिल्म में म्यूजिक इंडस्ट्री की असलियत को दर्शाते हुए, एक यात्रा बताई गई है। पूरी फिल्म में पूरा खेल स्क्रीन प्ले का ही है। बीच-बीच में पूरब की आवाज सुनने को मिलती है जो इस फिल्म की कहानी बताता है। 

डायलॉग्स में कमजोर पड़ी यह फिल्म 

डायलॉग्स में कमजोर पड़ी यह फिल्म 

डायलॉग कुछ ज़्यादा नहीं है। और जीतने भी डायलॉग है वो खासा दमदार नहीं है। अच्छा स्क्रीन प्ले डायलॉग की कमी को पूरी तरह से ढँक रहा है। फिल्म में कोई भी ऐसा डायलॉग नहीं है, जो दर्शकों में मन में घर कर जाए।

म्यूजिक 

म्यूजिक 

फिल्म का म्यूज़िक बहुत प्यारा है, डायरेक्ट आत्मा से जुड़ता है। हर शब्द, हर धुन दिल तक पहुँचती है। शंकर-एहसान-लॉय का काम उसी अंदाज़ का दिखा है जिसके लिए वे जाने जाते हैं। श्रद्धा और फरहान की आवाज़ भी दिल में घर कर जाती है।

अच्छी रही एडिटिंग 

अच्छी रही एडिटिंग 

मूवी की एडिटिंग अच्छी की गई है। बीच-बीच में पुरानी यादों का संतुलन भी सही ढंग से प्रदर्शित किया गया है। एडिटर की मेहनत फिल्म में साफ़ नज़र आ रही है। 

कास्टिंग भी रहा ठीक 

कास्टिंग भी रहा ठीक 

फिल्म की कास्टिंग काफी हद तक ठीक थी। अर्जुन, पूरब, प्राची और श्रद्धा को जब-जब मौका मिला उन्होनें अपने किरदार को बखूबी निभाया। फिल्म में तितली फेम शशांक अरोरा ने भी उदय के किरदार को बखूबी निभाया है। 

डायरेक्शन रहा उम्दा 

डायरेक्शन रहा उम्दा 

फिल्म का डायरेक्शन भी काफी हद तक अच्छा है। हर सीन को अलग-अलग एंगल से दर्शकों तक पहुँचाने की कोशिश की गई है।

फरहान ने फिर अपने अभिनय से जीता दर्शकों का दिल 

फरहान ने फिर अपने अभिनय से जीता दर्शकों का दिल 

एक्टिंग का तो सबको पता ही है, हर बार की तरह इस बार भी फरहान ने परदे पर आग लगा दी। फरहान ने अपने रोल को बेहद उम्दा ढंग से निभाया है। श्रद्धा,अर्जुन, पूरब के लिए एक्टिंग का कोई ज्यादा मौका नहीं था मगर जहाँ भी उन्हें लिया गया उन्होंने किरदार के साथ पूरा न्याय किया। मगर यदि सब से ज्यादा तारीफ़ की जाए तो फिल्म में राहुल शर्मा के किरदार की करनी इस छोटे से रोल ने दर्शकों पर एक गहरी छाप छोड़ी है।

फिल्म समीक्षा- 5 में से 3 स्टार (3/5)

फिल्म समीक्षा- 5 में से 3 स्टार (3/5)

मैं इस फिल्म को पांच में से चार स्टार देता हूँ। स्टोरी अच्छी थी, डायरेक्शन बेहतर था और एक्टिंग में फरहान ने जान डाल दी थी। बस फिल्म में थोड़े से डायलॉग्स और होते तो मज़ा आ जाता।

क्या आप फरहान अख्तर की यह नै फिल्म देखने सिनेमाघरों का रुख अपनाएंगे?

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