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चाचा नेहरु के 'चाचा' बनने के पीछे की कहानी जानकर आप हैरान रह जायंगे!

आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री चाचा नेहरु अपनी ओजस्वी वाणी और दृढ़निश्चय सोच के कारण भारत के इतिहास में सदियों-सदियों के लिए अमर हो गए हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल एवं चाचा नेहरु के साझा प्रयास की वजह से ही आज भारत इतना विशाल और समृद्ध है। मगर इन महापुरुषों के चट्टानों जैसे विशाल व्यक्तित्व के छोटे-छोटे ज़र्रो में छोटी-छोटी कई कहानी छुपी होती है जिस पर हम ध्यान नहीं दे पाते। ऐसी ही चाचा नेहरु के व्यक्तित्व से जुड़ी कहानियाँ भी है।

चाचा नेहरु के 'चाचा' बनने के पीछे की कहानी जानकर आप हैरान रह जायंगे!

चाचा नेहरु के 'चाचा' बनने के पीछे की कहानी जानकर आप हैरान रह जायंगे!

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  in History & Culture

क्यों कहा जाता है चाचा 

क्यों कहा जाता है चाचा 

दरअसल अगर हम हमारे परिवार को ही ले लें तो हमें सबसे ज्यादा प्यार हमारे चाचा ही करते हैं।  पापा से डर लगता है, दादा-दादी से हम बातें शेयर नहीं कर सकते और माँ को सब कुछ बता नहीं सकते, ऐसे में ले दे कर हमारे पास चाचा ही रहते हैं जो हमे प्यार करते भी हैं और प्यार जताते भी हैं। ऐसी ही शख्सियत थी चाचा नेहरु की भी।

कब शुरू हुआ यह बाल दिवस 

कब शुरू हुआ यह बाल दिवस 

1954 में बाल दिवस को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्रदान हो गई थी। वैसे तो संयुक्त राष्ट्र ने बाल दिवस 20 नवम्बर को मनाने की घोषणा की थी मगर अलग-अलग देशो में यह अलग-अलग दिन मनाया जाता है, हालाँकि कुछ देशों में यह 20 नवंबर को भी मनाया जाता है।

चाचा नेहरु की कुछ अनसुनी कहानियाँ 

चाचा नेहरु की कुछ अनसुनी कहानियाँ 

कहते हैं चाचा नेहरु के निवास स्थान त्रिमूर्ति भवन में एक लम्बा चौड़ा बगीचा था। चाचा नेहरु को पेड़ पौधों से बहुत प्रेम था। ऐसे ही वे एक दिन अपने बगीचे की सैर को निकले हुए थे कि तभी उनकी नजर एक रोते बच्चे पर पड़ी, उन्होंने इधर-उधर देखा मगर उस बच्चे की माँ उन्हें कहीं नहीं मिली।  

बच्चा और तेज़ रोने लगा 

बच्चा और तेज़ रोने लगा 

इधर बच्चा और जोर से रोने लगा, चाचा नेहरु ने बिना एक क्षण गँवायें बच्चे को अपनी गोदी में उठा लिया और एक माँ की तरह उसे दुलार करने लगे जिससे बच्चा कुछ ही पल में चुप हो गया और मुस्कुराने लगा। बच्चे को मुस्कुराता देख चाचा नेहरु खुद भी मुस्कुराने लगे।

तमिलनाडु में भी ऐसा ही कुछ हुआ

तमिलनाडु में भी ऐसा ही कुछ हुआ

तमिलनाडु में भी कुछ ऐसा ही बीता था, उस समय चाचा नेहरु को देशवासी काफी मानते थे और उनकी एक झलक पाने के लिए कितनी कोशिश करते थे उसका एक उदाहरण भी इस दौरे में देखने को मिलता है।  

खचाखच भरी हुई थी सड़कें 

खचाखच भरी हुई थी सड़कें 

नेहरु जी को देखने के लिए तमिलनाडु की सड़कें खचाखच भरी हुई थी। लोग ओटली छज्जे पर चढ़ कर नेहरु जी को देखने की कोशिश कर रहे थे। उन्ही में एक गुब्बारे वाला भी था जो अपने पंजे पर खड़ा हो कर नेहरु जी को देखने की कोशिश कर रहा था।  

गुब्बारे बच्चों में बाँट दिए 

गुब्बारे बच्चों में बाँट दिए 

नेहरु जी की नजर जैसे ही हवा में झूलते रंग-बिरंगे गुब्बारों पर पड़ी उन्होंने वहीं गाड़ी रुकवा ली। नेहरु जी खुद गाड़ी से उतरे और गुब्बारे वाले की तरफ चल दिए। यह देख कर गुब्बारे वाला घबरा गया, चाचा नेहरु ने उसके सारे गुब्बारे खारीद लिए और वहाँ मौजूद सारे बच्चों में बंटवा दिए।  

ऐसे थे चाचा नेहरु, उनके जन्मदिन पर उन्हें आत्मीय श्रद्धांजलि और सभी बच्चों को बाल दिवस की शुभकामनाएँ।

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