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दर्दनाक! हॉस्पिटल ने नहीं दी एम्बुलेंस, पति को 80 किमी घसीट कर ले जानी पड़ी पत्नी की लाश

कभी-कभी तो लगता है सच-मुच कलयुग आ गया है। हम जिस समाज में रह रहे हैं वह मुर्दों की बस्ती बनता जा रहा है। कोई मानवीय भावना नहीं, कोई संवेदना नहीं, यहाँ अपना दर्द तो हम चिल्ला-चिल्ला कर बताते हैं मगर किसी और के दर्द को देख कर भी अनदेखा कर देते हैं। आज के दौर में रिश्ते भी मात्र मतलब के रह गए हैं।

और जब ऐसा मतलबी दौर आ जाए जहाँ पैसा ही माय-बाप बन गया हो उस दौर में गरीबों के साथ अत्याचार होना कोई नई बात नहीं लगती। ऐसा ही कुछ बीता हैदराबाद के गरीब रामुलू एकेड के साथ जिसकी कहानी ने मेरे अंतरमन तक को झंझोड़ दिया।    

दर्दनाक! हॉस्पिटल ने नहीं दी एम्बुलेंस, पति को 80 किमी घसीट कर ले जानी पड़ी पत्नी की लाश

दर्दनाक! हॉस्पिटल ने नहीं दी एम्बुलेंस, पति को 80 किमी घसीट कर ले जानी पड़ी पत्नी की लाश

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घसीट कर ले जानी पड़ी लाश 

घसीट कर ले जानी पड़ी लाश 

तेलंगाना हैदराबाद के रहने वाले 53 साल के रामुलू एकेड की पत्नी लेप्रेसी की बीमारी से ग्रस्त थी और अंत में गरीबी और बीमारी दोनों से हार गई। रामुलू ने अस्पताल वालों से एम्बुलेंस के लिए गुहार लगाई मगर हर किसी ने उसकी चीख को अनसुना कर दिया। सही भी है, उस गरीब इंसान की चीख सुनने से अस्पताल प्रशासन को कौन सा फायदा होने वाला था। लिहाज़ा रामुलू को अपनी पत्नी की लाश 80 किमी तक खींच कर ले जाना पड़ा।        

अपना दर्द सुनाते-सुनाते छलक पड़े रामुलू के आँसू 

अपना दर्द सुनाते-सुनाते छलक पड़े रामुलू के आँसू 

जब रामुलू का हाल जानने उसकी कहानी सुनने लोग पहुँचे तो अपनी दर्द भरी कहानी सुनाते-सुनाते रामुलू अपने आँसू नहीं रोक पाए। कहने को रामू खुद भी लेप्रेसी बिमारी से ग्रस्त है, मगर उसे गरीबी जितनी तकलीफ दे रही है उतनी शायद उसकी बीमारी नहीं दे रही।     

भीख मांग कर करते हैं, गुजर-बसर  

भीख मांग कर करते हैं, गुजर-बसर  

रामुलू के पास कमाई का ज़रिया नहीं है और न ही उनके आगे पीछे कोई है, लिहाज़ा नियति ने उन्हें दर-दर पर भटकने और दूसरों के सामने हाथ फैलाने के लिए मजबूर कर दिया। जिसका कोई नहीं होता उसका खुदा होता है, रामुलू भी अपने गुज़र बसर के लिए हैदराबाद के मंदिरों में भीख मांगता है।    

अस्पताल ने 5000 रुपयों के खातिर ताक पर रख दी इंसानियत 

अस्पताल ने 5000 रुपयों के खातिर ताक पर रख दी इंसानियत 

सूत्रों की माने तो जब रामुलू ने अपनी कविथा की लाश को उनके पैतृक गाँव माइकोड ले जाने के लिए एम्बुलेंस मांगी तो अस्पताल प्रशासन ने उससे 5000 रुपयों की मांग कर डाली। वक्त के हाथों प्रताड़ित रामुलू ने जिस गद्दे पर उनकी पत्नी का देहांत हुआ था उसी को घसीट कर अपने घर ले जाने का निर्णय ले लिया।  

मगर आख़िरकार उसकी हिम्मत जवाब दे गई 

मगर आख़िरकार उसकी हिम्मत जवाब दे गई 

रामुलू ने चलना शुरू किया, यूँ तो वह अपनी हमसफर के साथ था, मगर था अकेला। रामुलू 24 घंटे लगातार चलकर बिना रुके बिना खाए शनिवार शाम तक बिकराबाद नाम की जगह पर पहुँच गया। यहाँ पहुँच कर रामुलू का हौसला टूट गया और उसने ... 

सड़कों पर बैठ कर रोना शुरू कर दिया 

सड़कों पर बैठ कर रोना शुरू कर दिया 

रामुलू ने अपनी पत्नी की लाश को सड़क किनारे लेटाया और ज़ोर से रोने लग गया और लोगों के सामने मदद की भीख मांगने लग गया। उसकी खुद्दारी को तो सालों पहले गरीबी ने रौंद ही दिया था। मगर आज उसकी पत्नी की मौत के बाद उसने अपना हौसला भी तोड़ दिया।  

पुलिस की मदद से पहुँचाया घर 

पुलिस की मदद से पहुँचाया घर 

दुनिया में सारे लोग एक जैसे नहीं होते, शायद इसी वजह से यह दुनिया अब भी कायम है। रामुलू के आँसुओ ने उन लोगों के दिलों में दया बनाई जो इस मुर्दों की बस्ती में रहते हुए भी जिंदा थे। आस-पास के गाँव वालों और पुलिस वालों ने एम्बुलेंस मंगाई जो रामुलू और उसकी पत्नी को सही सलामत उनके पैतृक गाँव छोड़ कर आई।  

कुछ तो शर्म करो 

कुछ तो शर्म करो 

"अंधकार है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं है, मुर्दा है वह देश जहाँ इंसानियत नहीं है।"

कभी किसी असहाय की सहायता करके देखना अच्छा लगता है, जिस देश की आबो-हवा में इंसानियत जिंदा रहती है उस देश में सांस लेना अच्छा लगता है। किसी एक दिन बस एक दिन अपना ज़मीर ले कर अपने घर जाना, उसके बाद जो सुकून की नींद आएगी उसे महसूस करके देखना कितना अच्छा लगता है। मुर्दा रहना ही है तो मुर्दा ही रहो मगर कभी जिंदगी को नए सिरे से जी कर देखना अच्छा लगता है।

क्या इस दुनिया से सचमुच इंसानियत ख़त्म हो चुकी है?

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