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जानें सरकार द्वारा NDTV इंडिया को बैन करने का फैसला किस हद तक है सही

हिंदी के एक जाने-माने समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया को एक दिन के लिए बैन कर दिया गया है। यह खबर जितनी चौंकाने वाली है उतने ही चौंकाने वाले इसके पहलू भी हैं। कुछ लोग इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं तो कुछ लोग इसे पत्रकारिता की हत्या बता रहे हैं।

किसी एक बड़े शायर ने कहीं लिखा है "कुछ तो मजबूरियाँ रही होगी, यूँ ही कोई बेवफा नहीं कहता" तो क्या सच-मुच एनडीटीवी ने जो किया था उसके लिए उसे सज़ा मिलनी चाहिए थी। या फिर यह मीडिया को दबाने की साजिश है? सवाल काफी संजीदा और उलझे हुए हैं। 

आइये कोशिश करते हैं इसकी पूरी सच्चाई जानने की। 

जानें सरकार द्वारा NDTV इंडिया को बैन करने का फैसला किस हद तक है सही

जानें सरकार द्वारा NDTV इंडिया को बैन करने का फैसला किस हद तक है सही

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एक दिन के लिए ऑफ़ एयर होगा एनडीटीवी 

एक दिन के लिए ऑफ़ एयर होगा एनडीटीवी 

भारत सरकार के प्रसारण मंत्रालय ने आज एनडीटीवी इंडिया को एक दिन के लिए ऑफ एयर करने का फैसला सुना दिया। इस खबर ने जितनी पत्रकारिता के जगत में खलबली मचाई उतना ही शोर राजनैतिक गलियारों में भी किया। हर किसी ने इस आग का बेहतर उपयोग किया और अपनी-अपनी रोटी सेंकने की कोशिश में लग गए।

पठानकोट हमले पर कवरेज की मिली सज़ा 

पठानकोट हमले पर कवरेज की मिली सज़ा 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एनडीटीवी इंडिया को पठानकोट हमले में गलत तरीके से कवरेज कर संवेदनशील जानकारियों को लीक करने का अपराधी बनाया। साथ ही मंत्रालय ने यह भी आरोप लगाया कि एनडीटीवी की वजह से ही आतंकवादियों को उनके हर मूवमेंट की खबर मिल रही थी।

क्या कहा भारत सरकार ने

क्या कहा भारत सरकार ने

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने केबल टीवी नेटवर्क (रेगुलेशन) एक्ट का हवाला देते हुए अपने शक्तिपत्र में लिखा "9 नवम्बर 2016 से 10 दिसंबर 2016 तक एक दिन के लिए एनडीटीवी इंडिया को किसी भी मंच पर प्रसारण करने की रोक है।"

यह पहला मामला है जब किसी न्यूज़ चैनल को आतंकवादी हमले की गलत कवरेज की वजह से बैन किया गया हो।

क्या टी.आर.पी. देश की सुरक्षा से भी ज्यादा जरुरी है?

क्या टी.आर.पी. देश की सुरक्षा से भी ज्यादा जरुरी है?

इन दिनों एक इल्ज़ाम हमेशा से ही पत्रकारों पर लगता रहता है, लोग तंज़ कसते हैं कि पत्रकारों में अब कोई मानवीय भावना नहीं बची है। आज के दौर में पत्रकारों की नज़र सिर्फ और सिर्फ टी.आर.पी. पर ही रहती है। तो क्या टी.आर.पी. की दौड़ में अंधे हो कर पत्रकार खुद ही पत्रकारिता का गला घोंट रहे हैं? यह पत्रकारों के लिए भी सोचने का विषय है और देश के लिए भी।

जानकारियां कथित तौर पर आतंकवादियों तक पहुंचाई गई 

जानकारियां कथित तौर पर आतंकवादियों तक पहुंचाई गई 

एनडीटीवी पर जब जनवरी में यह ऑपरेशन चल रहा था, तब उस दौरान कथित तौर पर आतंकवादियों तक सूचनाएं पहुँचाने का गंभीर आरोप चैनल के ऊपर लगाया गया है। एयर बेस में मौजूद गोला बारूद, मिग, लड़ाकू विमानों, रॉकेट लॉन्चर, मोर्टार, हेलीकॉप्टरों, ईंधन टैंक आदि की जानकारी प्रसारित की गई। साथ ही साथ एनडीटीवी ने वहाँ से भागने के संभावित रास्तों का भी ज़िक्र किया। ज़ाहिर तौर पर यह सूचना आतंकवादियों के लिए मददगार साबित हो सकती थी।

हमने जो जानकारी दी वह तो लोगों तक पहले ही पहुंच गई थी

हमने जो जानकारी दी वह तो लोगों तक पहले ही पहुंच गई थी

अपने जवाब में चैनल ने कहा है कि "यह व्यक्तिपरक व्याख्या का एक मामला था। इस मामले में प्रसारित ज्यादातर जानकारी तो हमने सोशल मीडिया और लोकल न्यूज़ पेपरों से उठाई थी।" मतलब इस मामले में एनडीटीवी का साफ़-साफ़ यह कहना है कि उसने कुछ नया नहीं दिखाया, जो सोशल मीडिया या न्यूज़ पेपरों पर चल रहा था वही उन्होनें भी दिखाया।

सिर्फ एनडीटीवी को ही क्यों निशाना बनाया 

सिर्फ एनडीटीवी को ही क्यों निशाना बनाया 

मगर यहाँ सवाल यह उठता है कि जब एनडीटीवी ने यह खबर दिखाई तो जाहिर सी बात है और दूसरे न्यूज़ चैनलों ने भी इस तरह की खबर को दिखाया ही होगा। तो यह इतना बड़ा फैसला, इतना कड़ा रुख सरकार ने सिर्फ एनडीटीवी पर ही क्यों दिखाया? क्या सरकार का यह फैसला पक्षपातपूर्ण है या मीडिया को सरकार की शक्ति दिखाने का महज़ एक कदम है। 

एनडीटीवी इंडिया बनाम भारत सरकार  

एनडीटीवी इंडिया बनाम भारत सरकार  

सरकार का दावा है कि पठानकोट हमले पर एनडीटीवी इंडिया की कवरेज से संवदेनशील सूचनाएं आतंकवादियों के पास पहुंचीं वहीं एनडीटीवी ने अपने जवाब में कहा कि उसने कोई भी गोपनीय सूचना सार्वजनिक नहीं की है।

क्या आपकी नज़र में NDTV इंडिया के खिलाफ भारतीय सरकार का यह फैसला एक सही कदम है?

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