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कैसे हुई दिवाली पर पटाख़ों की शुरुआत?

कह दो अंधेरों से कहीं और घर बना लें
मेरे शहर में रौशनी का सैलाब आया है।


दिवाली की खुशियाँ हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे चुकी हैं।घर में लोगों का जमावाड़ा लगा हुआ है और इन सब कामों के दरमियान चैन के दो पल मिलते नहीं, तो हुआ यूँ के थोड़ी आलसी काटने के चक्कर में मैं भी अपनी छत पर पहुँच गई और जो नज़रे असमान की तरफ उठी तो ज़मीन पर वापस दुबारा निगाहें टिकाने का दिल ही नहीं चाहा।

ख़ैर मुद्दे की बात यह है कि आतिशबाज़ी का सिलसिला कैसे शुरू हुआ? यह तो मैं जानती हूँ कि यह पर्व श्री राम भगवान के अयोध्या से लौटने पर, अपने घरों को दीयों से रौशन करके मनाया जाता है।लेकिन पटाख़ों और आतिशबाज़ी के सिलसिले के पीछे कौन है? यह खोज बीन करने पर दो नाम सामने आए अय्या नादर और शंमुगा नादर।

आइए जानते हैं इनके बारे में।  

कैसे हुई दिवाली पर पटाख़ों की शुरुआत?

कैसे हुई दिवाली पर पटाख़ों की शुरुआत?

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  in Desi

कहाँ से हुई शुरुआत?

कहाँ से हुई शुरुआत?

रौशनी का त्योहार  दिवाली जो कि एक नई उमंग लेकर आती है। दीवाली से कई मनोरंजक परम्पराएं जुड़ी हैं। आतिशबाजी से मानो पूरा आसमान सजा-धजा दिया जाता हो।दीवाली दीयों के साथ-साथ, राकेट-पटाखों का त्यौहार भी है और इन पटाख़ों की शुरुआत करने वाले "नादर ब्रदर्स" है। 

अय्या नादर और शंमुगा नादर ने की थी शुरुआत 

अय्या नादर और शंमुगा नादर ने की थी शुरुआत 

P. Ayya Nadar और उनके भाई Shanmuga Nadar तमिल नाडु के एक छोटे से क्षेत्र सिवकासी के रहने  वाले थे।इन्होंने दक्षिण भारत के छोटे से शहर सिवकासी को एक बड़े संपन्न औद्योगिक शहर में बदल दिया है।इस छोटी सी पहल ने कई लोगों के लिए रोजगार का साधन भी किया। 

दोनों भाइ रोजगार की तलाश में कलकत्ता गए 

दोनों भाइ रोजगार की तलाश में कलकत्ता गए 

सन 1923 में रोज़गार की तलाश में अय्या नादर और शंमुगा नादर का कलकत्ता जाना हुआ। दोनों भाई माचिस की फैक्ट्री में काम करने लगे और 8 महीने बाद सिवकासी लौटकर अपनी खुदकी फैक्ट्री का आग़ाज़ किया। 

अनिल माचिस के साथ हुई थी शुरुआत 

अनिल माचिस के साथ हुई थी शुरुआत 

अय्या नादर और उनके भाई शंमुगा नादर ने अपने बिज़नेस की शुरुआत "अनिल माचिस" के साथ की थी। शीघ्र ही यह बिज़नेस ने तेज़ी पकड़ लीया और माचिस बनाने के साथ-साथ नादर ब्रदर्स ने "Ayya Fireworks" के नाम से पटाखों का कारोबार भी आरम्भ कर दिया। 

पूर्व समय में आतिशबाज़ी पर रोक थी 

पूर्व समय में आतिशबाज़ी पर रोक थी 

दिवाली पर पटाखों की शुरुआत अय्या नादर और उनके भाई शंमुगा नादर द्वारा की गई थी। मुग़ल शासन के समय से पूर्व तक दिवाली पर पटाखें नहीं जलाए जाते थे।इतिहास के परनो में यह बात भी दर्ज है कि औरंगज़ेब ने अपने शासन काल में आतशबाज़ी पर रोक लगा दी थी। 

189 के करीब पटाख़ों की फैक्टरियाँ है सिवकासी में 

189 के करीब पटाख़ों की फैक्टरियाँ है सिवकासी में 

1940 के बाद ही दिवाली पर आतिशबाज़ी का सिलसिला आरम्भ हुआ। एक छोटे से कसबे सिवकासी का अब यह आलम है की सिर्फ सिवकासी में ही 189 फैक्ट्रियाँ स्थापित हो चुकी हैं। 

होने लगी है मज़दुरों की कमी 

होने लगी है मज़दुरों की कमी 

हर सिक्के के दो पहलु होते हैं एक जो अच्छाई दर्शाता है और दूसरा जो बुराइयों से रूबरू करवाता है।उसी तरह सिवकासी भी एक ऑद्योगिक शहर बन चूका है लेकिन साथ ही साथ अब जैसे-जैसे लोग साक्षरता की ओर कदम बढ़ाने लगे है।पटाख़ों के कारोबर में मज़दूरों की कमी पढ़ने लगी है। 

इस दिवाली रखें सुरक्षा का ख़्याल 

इस दिवाली रखें सुरक्षा का ख़्याल 

देखिये इसमें कोई दो राय नहीं है की हमें "eco-friendly" दिवाली मनाना चाहिए लेकिन साथ ही साथ यह भी सच है की "दिल है की मानता नहीं" अब इसपर ज़्यादा कुछ कहना तो ठीक नहीं होगा।लेकिन आतिशबाज़ी करते समय अपना ध्यान ज़रूर रखें और किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचें।

आप सभी को दिवाली की बहुत बहुत शुभकामनाएं। 

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