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टाटा समूह ने तोड़ी चुप्पी, मिस्त्री खो चुके थे ट्रस्ट का भरोसा 

I don't believe in taking right decisions, I take decisions and then make them right 

-Ratan Tata

इस कथ्य में रतन टाटा ने साफ़तौर से यह कह तो दिया कि वह सही फैसले लेने में विश्वास नहीं करते बल्कि फैसले ले कर उन्हें सही साबित कर देते है। रतन जी आपका फैसला सही साबित होगा या नहीं यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा लेकिन आपके हाल ही के फैसले ने बिज़नेस जगत में काफी सवाल खड़े कर दिए हैं।

कभी हमकदम रहे सायरस और रतन जी के बीच जो दरार आई है उसका स्पष्टीकरण सभी को चाहिए। रतन टाटा के नजदीकी लोगों का मानना है कि मिस्त्री ट्रस्ट का भरोसा खो चुके थे। मिस्त्री को हटाने का फैसला ट्रस्ट द्वारा लिया गया है। ट्रस्ट की 18.5 पर्सेंट हिस्सेदारी कंस्ट्रक्शन टाइकून पालोन्जी मिस्त्री के पास है, जो सायरस मिस्त्री के पिता भी हैं। आइये जानते हैं और कौन सी बातें सामने आई है। 

टाटा समूह ने तोड़ी चुप्पी, मिस्त्री खो चुके थे ट्रस्ट का भरोसा 

टाटा समूह ने तोड़ी चुप्पी, मिस्त्री खो चुके थे ट्रस्ट का भरोसा 

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टाटा समूह ने तोड़ी चुप्पी 

टाटा समूह ने तोड़ी चुप्पी 

चार साल के अपने इस काल में सायरस के कई मुख्य फैसले सामने आए जो टाटा ग्रुप के लिए फायदेमंद नहीं थे। टाटा समूह का कहना है कि साइरस मिस्त्री को टाटा सन्स के चेयरमैन पद से हटाए जाने के पीछे की अहम वजह सायरस का कंपनी की पॉलिसी को प्रथम मुख्यता ना देना भी था। 

मखमल में लपेट कर दिया जवाब 

मखमल में लपेट कर दिया जवाब 

भारत के सबसे बड़े समूह टाटा ग्रुप के 148 साल के इतिहास में ऐसा कुछ पहली बार सामने आया है। ऐसा अक्सर देखा जाता है कि इस  HI-Tech generation में धीमी गति से चलने वाले लोग पीछे रह जाते हैं। सायरस ने चैयरमैन पद सम्भालने के पश्चात तीन साल तो काम समझने में ही लगा दिए थे। 

मिस्त्री को काम करने का तरीक़ा पता था 

मिस्त्री को काम करने का तरीक़ा पता था 

अगर सायरस मिस्त्री के सफर की बात की जाए तो वह टाटा समूह के साथ सन 2006 से जुड़े हुए थे। 2011 में वह डिप्टी चैयरमैन के पद पर थे और 2012 में रतन टाटा ने अपना कार्य-भार पूरी तरह से सायरस को सौंप दिया। इतने सालों में तो नव-जात शिशु भी चलना सीख जाता है फिर सायरस ने कंपनी के कामकाज को जानने में इतना समय क्यों लगा दिया?

अंतरिम चैयरमैन रतन टाटा अभी भी चुप हैं 

अंतरिम चैयरमैन रतन टाटा अभी भी चुप हैं 

हालांकि मुख्य कारण अभी भी सामने नहीं आया है लेकिन आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला बड़े उफान पर है। टाटा समूह का कहना है कि साइरस मिस्त्री के चेयरमैन बनने के बाद से मिस्त्री व टाटा ग्रुप के मुख्य शेयरहोल्डर ट्रस्टीज़ के बीच अलगाव आ चुका था। 

ट्रस्ट ने उठाए सवाल 

ट्रस्ट ने उठाए सवाल 

टाटा ग्रुप के ट्रस्टीज, लगातार सायरस के निर्णय पर सवाल खड़े करते जा रहे थे। सायरस के हाथ में मैनेजमेंट की कमान होने के बावजूद भी सायरस के लिए हुए फैसलों से कंपनी को बड़े नुकसान हुए हैं। मिस्त्री के निर्देशन के दौरान पूरा समूह केवल दो कंपनियों - टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और जैगुआर लैंड रोवर पर ही निर्भर हो गया था। 

 मिस्त्री ने उठाए सवाल

 मिस्त्री ने उठाए सवाल

सायरस मिस्त्री ने एक ईमेल के जरिए कहा है कि टाटा नैनो कार की परियोजना रतन टाटा द्वारा शुरू की गई थी, जो एक घाटे वाली परियोजना है। साथ ही साथ मुंद्रा पावर प्रोजेक्ट में जो घाटा हुआ था वह भी रतन टाटा के फैसले के कारण हुआ था। सायरस ने कई ऐसे सवाल ला कर खड़े कर दिए हैं, जो रतन टाटा और टाटा समूह के ट्रस्टीज पर सवाल उठाते हुए दिखाई दे रहे हैं। 

मिस्त्री को अब यह सब याद क्यों आया

मिस्त्री को अब यह सब याद क्यों आया

टाटा समूह ने मिस्त्री के सवालों को सिरे से नकार दिया है और सायरस के इन सवालों को निराधार बताते हुए कहा कि सायरस को यह सारी बातें अब ही क्यों याद आ रही हैं। यह बात भी सामने आई है कि सायरस मिस्‍त्री इस फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने वाले हैं। मिस्‍त्री बॉम्‍बे हाई कोर्ट में टाटा सन्‍स लिमिटेड के इस फैसले को चुनौती देंगे।

आगे-आगे देखो होता है क्या 

आगे-आगे देखो होता है क्या 

ज़ाहिर सी बात है इस घटनाक्रम से खुश तो कोई भी नहीं है, लेकिन मिस्त्री को हटाने के अलावा कोई विकल्प बचा नहीं रह गया था। यह बात तो सामने है कि दोनों ही पक्षों के बीच "Cold War" जारी है। अब इसका परिणाम तो आने वाला वक़्त ही बताएगा।

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