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चीन के लिए काफी है बस हमारा एक शहर, जिसका होता है 5000 करोड़ का बिजनेस

घर से बाहर झांकों तो हर तरफ चीनी सामान के विरोध में नारे लगते ही दिखते हैं। कहा जाता है हर साल हमारे यहाँ से दीपावली के समय करोड़ों रुपयों का फायदा चीन को होता है, मगर ऐसा नहीं है कि दीपावली पर सिर्फ विदेश में ही पैसा जाता है। अगर सच्चाई देखी जाए तो विदेश में जाने वाले पैसे का मोटा हिस्सा हमारे देश के व्यापारियों के पास भी जाता है जिससे उनके घर का दिया जलता है, यह समय विचार करने का है कहीं हम चीनी समान का विरोध करने के चक्कर में जाने-अनजाने किसी गरीब हिन्दुस्तानी की थाली में से रोटी तो नहीं छीन रहे।

और रही व्यापार की बात तो हिंदुस्तान का यह अकेला शहर कमाई के मामले में चीन को पीछे छोड़ देता है। जानें इस शहर की और क्या है खासियत। 

चीन के लिए काफी है बस हमारा एक शहर, जिसका होता है 5000 करोड़ का बिजनेस

चीन के लिए काफी है बस हमारा एक शहर, जिसका होता है 5000 करोड़ का बिजनेस

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शिवकाशी पटाखा बाज़ार की राजधानी 

शिवकाशी पटाखा बाज़ार की राजधानी 

तमिलनाडु शिवकाशी को पटाखा बाज़ार की राजधानी कहा जाता है। अगर दीपावली के समय में चीन से पहले कोई शहर सुर्खियाँ बटोरता दिखता है तो वह है शिवकाशी। दूसरे विश्व युद्ध के समय से यहाँ पर पटाखे बन रहे हैं।  

यहाँ 5000 करोड़ का सालाना व्यापर होता है 

यहाँ 5000 करोड़ का सालाना व्यापर होता है 

हाँ जी, दिल की धड़कनों को थाम लो क्योंकि बात एकदम चौंकाने वाली है, शिवकाशी का सालाना व्यापार 5000 करोड़ का है। मगर यह पटाखे बनाने की कहानी भी बहुत रोचक है, आपको जान कर हैरानी होगी कि पटाखे बनाने की प्रेरणा माचिस बनाने से मिली थी, जिस की शुरुआत शिवकाशी में न हो कर कलकत्ता में हुई थी। आइये जानते हैं इसका पूरा राज..  

पटाखे का मतलब गन पाउडर 

पटाखे का मतलब गन पाउडर 

20 वी शताब्दी तक हमारे लिए पटाखों का मतलब या तो गन पाउडर से था या आयरन बोरिंग से। इससे ज्यादा हम उसके बारे में और कुछ नहीं जानते थे। 20 वी शताब्दी में दास गुप्ता नाम के एक जाने-माने व्यापरी ने माचिस की फैक्ट्री की शुरुआत की थी।  

उसी दौरान दो व्यापारी घूमने आये यहाँ 

उसी दौरान दो व्यापारी घूमने आये यहाँ 

उसी दौरान दो व्यापारी शानमुगा नाडर और इया नाडर व्यापर के सिलसिले में कलकत्ता घूमने आये थे। यह महज़ संयोग की बात है कि जिस लॉज में वे ठहरे थे, उसी के पास दास बाबू की माचिस की फैक्ट्री थी। वो फैक्ट्री इतनी आकर्षक थी कि यह दोनों व्यापारी इससे मोहित हुए बिना रह नहीं पाए।     

कलकत्ता से शिवकाशी पहुँचा तरीका 

कलकत्ता से शिवकाशी पहुँचा तरीका 

शानमुगा नाडर और इया नाडर को माचिस बनाने का व्यापार इतना भाया कि उन्होंने दास बाबू से प्रेरणा ले कर शिवकाशी में भी माचिस बनाने की फैक्ट्री डाल ली। ईश्वर की दया से व्यापार कामयाब हो गया और जल्द ही वे सफलता की सीढ़ी चढ़ने लगे।  

जर्मन के पटाखे फटते थे हिंदुस्तान की दीवाली में 

जर्मन के पटाखे फटते थे हिंदुस्तान की दीवाली में 

इससे पहले हिंदुस्तान में पटाखे नहीं बनते थे, हिंदुस्तान में पटाखे जर्मनी और इंग्लैंड से इंपोर्ट किये जाते थे। आसमान तो देशी होता था मगर उसमें रंग विदेशी होता था। मगर इसके बाद माचिस के व्यापार में सफलता मिलने के बाद दोनों व्यापारियों ने पटाखे की फैक्ट्री भी डाल ली।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पनपने लगा पटाखा कारोबार 

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पनपने लगा पटाखा कारोबार 

द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के समय स्टैंडर्ड फायरवर्क, कालिसवारी फायरवर्क और नेशनल फायरवर्क देश में बड़े पटाखा कारोबारी बन गए थे। शिवकाशी बड़ी पटाखा इंडस्ट्री के तौर पर डेवलप होने लगा। देश में दिवाली के समय अधिकतम पटाखे बिकने लगे। अब तो पटाखे बनाने के लिए लगने वाला रॉ मटेरियल भी देश में ही बनने लगा।

क्यों चुना गया शिवकाशी को 

क्यों चुना गया शिवकाशी को 

शिवकाशी में कम बारिश होने और ड्राई क्लाइमेट के कारण शिवकाशी पटाखा बनाने के लिए बेस्ट डेस्टिनेशन बन गया। यहां का मौसम भी पटाखे बनाने के लिए बेहतर है। इसी वजह से इसके आसपास के एरिया में पटाखों का प्रोडक्शन बढ़ने लगा। आज शिवकाशी का व्यापार चीन के व्यापर को टक्कर दे रहा है। 

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