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जानें समुन्द्र मंथन से निकले 14 रत्नों के बारे में, क्यों है वो इतने अनोखे? 

हम सबने एक पौराणिक कथा सुनी हुई है कि किस तरह देवताओं और असुरों ने मिलकर समुन्द्र मंथन किया। हम सबने सुना है कि कैसे बम भोले ने उफनता हुआ विष अपने कंठ में रख लिया और नीलकंठ भगवान हो गए। हम सबने सुना है कैसे भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धर कर सारा अमृत देवताओं को बाँट दिया। यह सब चीजें हमने सुनी है, मगर समुन्द्र मंथन सिर्फ विष और अमृत पर सीमित नहीं है, समुन्द्र मंथन में निकले 14 रत्न अपने आप में एक अलग विशेषता रखते हैं।

आइये जानते हैं इन्हीं विशेष रत्नों के बारे में। 

जानें समुन्द्र मंथन से निकले 14 रत्नों के बारे में, क्यों है वो इतने अनोखे? 

जानें समुन्द्र मंथन से निकले 14 रत्नों के बारे में, क्यों है वो इतने अनोखे? 

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1. हलाहल विष

1. हलाहल विष

वैसे कहा जाता है किसी भी काम की शुरुआत मीठे से होनी चाहिए मगर समुन्द्र मंथन की कहानी में शुरुआत गर्म हलाहल विष से हुई। कहा जाता है कि उस विष की ज्वाला इतनी ज्यादा तेज़ थी कि देवताओं और दानवों का वहाँ खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था। देवताओं और दानवों ने मिलकर भगवान शिव शंकर की आराधना की और शंभू ने अपने दोनों हाथों में उस हलाहल विष को ले लिया और पी गए। मगर उन्होनें उसे अन्दर नहीं उतारा बल्कि किसी आभूषण की तरह उसे गले में सज़ा लिया तब ही से वे नीलकंठ कहलाए।

2. कामधेनु 

2. कामधेनु 

विष के बाद जब समुद्र को फिर मथना शुरू किया गया तो कुछ ही पल के बाद चारों ओर एक अज़ीब सी ध्वनि गूंजने लगी। थोड़ा और मथा तो समुन्द्र में से साक्षात सुरभि कामधेनु उत्पन्न हुई। सैकड़ों गायों से घिरी कामधेनु गाय का तेज़ देख कर सभी उस पर मोहित हो गए थे। कामधेनु का अर्थ होता है सबकी कामनाओं को पूरा करने वाली।

3. उच्चेः श्रवा अश्व  

3. उच्चेः श्रवा अश्व  

कामधेनु गाय के बाद समुन्द्र मंथन से निकला एक विशाल ताकतवर अश्व। बिजली की रफ़्तार से चलने वाल यह अश्व उड़ता भी था। अब इस प्रजाति के अश्व नहीं पाए जाते। इस बेहद सुन्दर अश्व को इंद्र ने अपने पास रखा था। 

4. ऐरावत हाथी 

4. ऐरावत हाथी 

इस धरती का सबसे शक्तिशाली जीव जितना शक्तिशाली होता है उससे कहीं ज्यादा सुन्दर भी होता है अब सोचो सामान्य हाथी इतना सुन्दर होता है तो फिर सफ़ेद हाथी को देखने का अनुभव तो अद्भुत ही होता होगा। समुन्द्र मंथन में से अश्व के बाद जो निकला वो ऐरावत हाथी कहलाया जो बाद में इंद्र का वाहन बना।

5. कौस्तुभमणि 

5. कौस्तुभमणि 

इच्छाधारी नागों के पास पाई जाने वाली मणि कौस्तुभमणि कहलाती है। मंथन में से निकलने वाल पाँचवां रत्न यही था। पुराणों में वर्णित है कि इस रत्न को विष्णु जी धारण करते हैं। कहा जाता है कि जब कालिया नाग को भगवान कृष्ण ने श्राप मुक्त करवाया था, तब नाग ने उन्हें यह उपहार स्वरुप दी थी।

6. कल्पद्रुम 

6. कल्पद्रुम 

कल्पद्रुम हिंदी पुराणों में एक रहस्य बनकर रह गया है। कोई भी विद्वान् अभी तक इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है कि आखिर कल्पद्रुम था क्या? कुछ विद्वान् कहते हैं कल्पद्र्म दुनिया का पहला ग्रन्थ था, तो कुछ विद्वान कल्पद्रुम को एक योग मानते हैं।   

7. रंभा 

7. रंभा 

समुद्रमंथन के दौरान एक बहुत खुबसूरत अप्सरा उत्पन्न हुई जिसे रंभा नाम दिया गया। रंभा को कुबेर की सभा में सौंप दिया गया। कहा जाता है उसी दौरान कुबेर के पुत्र नीलकुबेर और रंभा के बीच प्रेम उत्पन्न हो गया और रंभा नीलकुबेर के साथ पत्नी की तरह रहने लगी। कुछ विद्वान रंभा को परी भी कहते हैं।

8. माँ लक्ष्मी 

8. माँ लक्ष्मी 

समुन्द्र मंथन से आठवी चीज़ धन की देवी लक्ष्मी प्रकट हुई। स्वर्ण सी चमकती माँ लक्ष्मी को देख कर देवता और दानव दोनों ही हाथ जोड़कर खड़े हो गए। माँ लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को जयमाला पहनाकर अपने पति के रूप में स्वीकार किया और वैकुण्ठ निवासी हो गईं। 

9. वारुणी 

9. वारुणी 

वारुणी के कई अर्थ होते हैं मगर इस वारुणी का अर्थ मदिरा था जिसे असुरों ने अपने पास रखा था। वरुण का अर्थ होता है पानी और वारुणी का अर्थ होता है पानी से बना हुआ पदार्थ इसलिए इसे वारुणी नाम दिया गया। वरुण नाम के एक देवता भी थे जिन्होनें समुन्द्र मंथन के दौरान दानवों का साथं दिया था।

10. चंद्रमा 

10. चंद्रमा 

वारुणी के बाद जो समुन्द्र मंथन से निकला उसे चंद्रमा नाम दिया गया। कहते हैं चंद्रमा की 27 पत्नियाँ थी जो दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थी। इन्हीं के नाम पर 27 नक्षत्रों के नाम बने हैं। मगर चंद्रवंशियों का चंद्रमा से क्या संबंध है यह शोध का विषय है।   

11. पारिजात वृक्ष 

11. पारिजात वृक्ष 

पारिजात वृक्ष के फूल देवताओं को बहुत प्रिय होते हैं। यहाँ तक कि इसकी फूल-पत्तियों में औषधियों के गुण भी पाए जाते हैं। इसकी तुलना कल्पवृक्ष से भी की जाती है। ऐसा भी कहा जाता है कि जब देव नर्तकी नाचते-नाचते थक जाती थी तो वह पारिजात के पुष्पों को छू लेती थी और पल भर में ही उसकी सारी थकान मिट जाती थी।     

12. पाञ्चजन्य शंख

12. पाञ्चजन्य शंख

पाञ्चजन्य शंख शंखों का राजा होता है। महाभारत में जिस शंख को बजा कर युद्ध की घोषणा की थी वह पाञ्चजन्य शंख ही है। पाञ्चजन्य शंख को विष्णु भगवान ने अपने दाहिने हाथ में जगह दी है। पाञ्चजन्य शंख को बजाना अत्यंत शुभ माना जाता है। 

13. धन्वन्तरी वैद्य

13. धन्वन्तरी वैद्य

देवता और दानव जब काफी दिन तक समुद्र को मथने से थक गए तो उन्होंने मथना छोड़ दिया। मगर समुद्र रुकने वाला नहीं था। उसका मथना चलता रहा और उसी बीच समुन्द्र में से भगवान धन्वन्तरी प्रकट हुए। भगवान धन्वन्तरी विश्व के पहले वैद्य माने जाते हैं। इन्होने कई ग्रंथो की रचना की, मगर हम इनके ग्रंथो को संजो कर रख नहीं पाए। आज हमारे पास उनकी लिखी हुई धन्वन्तरी सहिंता ही है जिसे पढ़ कर ही विश्व ने आयुर्वेद को पहचाना।

14. अमृत 

14. अमृत 

सबसे उपयोगी चीज़ अंत में ही मिलती है समुन्द्र मंथन में भी यही हुआ। जिसके लिए पूरा मंथन किया गया वो अंत में उत्पन्न हुआ। जब अमृत उत्पन्न हुआ तो देवता और दानव दोनों आपस में लड़ने लगे। ऐसे में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धर कर छल से सारा अमृत देवताओं को पिला दिया।

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