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जाने क्या था खास इस शिवलिंग में, क्यों नहीं ले जा पाया रावण इसे लंका!

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में खूबसूरत पहाड़ी स्थल पालमपुर स्थित है। 1204 ई. में दो क्षेत्रीय व्यापारियों 'अहुक' और 'मन्युक' द्वारा स्थापित बैजनाथ मंदिर पालमपुर का एक प्रमुख आकर्षण है और यह शहर से 16 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। हिन्दू देवता शिव को समर्पित इस मंदिर की स्थापना के बाद से लगातार इसका विस्तार हो रहा है। यह प्रसिद्ध शिव मंदिर पालमपुर के 'चामुंडा देवी मंदिर' से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।

बैजनाथ शिव मंदिर दूर-दूर से आने वाले लोगों की धार्मिक आस्था के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह मंदिर वर्ष भर पूरे भारत से आने वाले भक्तों, विदेशी पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों की एक बड़ी संख्या को आकर्षित करता है। मगर जितना भव्य यह मंदिर है इसकी कहानी उससे भी ज्यादा रोचक है।

जाने क्या था खास इस शिवलिंग में, क्यों नहीं ले जा पाया रावण इसे लंका!

जाने क्या था खास इस शिवलिंग में, क्यों नहीं ले जा पाया रावण इसे लंका!

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 'चिकित्सा अथवा औषधियों का स्वामी' 'वैद्य+नाथ'

 'चिकित्सा अथवा औषधियों का स्वामी' 'वैद्य+नाथ'

शिव मंदिर बैजनाथ अर्थात 'वैद्य+नाथ', जिसका अर्थ है- 'चिकित्सा अथवा औषधियों का स्वामी', को 'वैद्य+नाथ' भी कहा जाता है। मंदिर पठानकोट-मंडी के बिल्कुल पास ही स्थित है। इसका पुराना नाम 'कीरग्राम' था, मगर मय के साथ यह मंदिर के नाम से प्रसिद्ध होता गया और ग्राम का नाम 'बैजनाथ' पड़ गया। 

रावण ने की कैलाश पार घोर तपस्या 

रावण ने की कैलाश पार घोर तपस्या 

बात त्रेता युग की है जब लंका का राजा रावण तीनों लोकों में अपना आधिपत्य स्थापित करने की महत्वकांक्षा लिए कैलाश पर्वत पर शिव के निमित्त तपस्या कर रहा था। जब कोई फल नहीं मिला तब उसने और भी घोर तपस्या प्रारंभ कर दी।

रावण ने अपने सर काटने प्रारंभ कर दिए 

रावण ने अपने सर काटने प्रारंभ कर दिए 

मगर जब फिर भी भगवान प्रसन्न नहीं हुए तो अंत में उसने अपना एक-एक सिर काटकर हवन कुंड में आहुति देकर शिव को अर्पित करना शुरू किया। दसवां और अंतिम सिर कट जाने से पहले शिवजी ने प्रसन्न हो प्रकट होकर रावण का हाथ पकड़ लिया। उसके सभी सिरों को पुर्नस्थापित कर शिव ने रावण को वर मांगने को कहा।

रावण ने शिवलिंग रूप में शिव को माँगा 

रावण ने शिवलिंग रूप में शिव को माँगा 

रावण ने शिव से कहा मैं आपके शिवलिंग स्वरूप को लंका में स्थापित करना चाहता हूँ। आप दो भागों में अपना स्वरूप दें और मुझे अत्यंत बलशाली बना दें। भगवान अपने भक्त को भला मना कैसे कर सकते थे उन्होंने तथास्तु कहा और लुप्त हो गए। लुप्त होने से पहले शिव ने अपने शिवलिंग स्वरूप दो चिह्न रावण को देने से पहले कहा कि इन्हें जमीन पर न रखना।

 बैजनाथ में पहुँचने पर रावण को लघुशंका का अनुभव हुआ

 बैजनाथ में पहुँचने पर रावण को लघुशंका का अनुभव हुआ

लंकापति रावण दोनों शिवलिंग को लेकर लंका की ओर चल दिया। रास्ते में 'गौकर्ण' क्षेत्र (बैजनाथ) में पहुँचने पर रावण को लघुशंका का अनुभव हुआ। उसने 'बैजु' नाम के एक ग्वाले को सब बात समझाकर शिवलिंग पकड़ा दिए और शंका निवारण के लिए चला गया।

बैजू शिवलिंग का भार नहीं उठा पाया 

बैजू शिवलिंग का भार नहीं उठा पाया 

मगर शिव की माया भी निराली है जिसके कारण बैजू उन शिवलिंगों के भार को अधिक देर तक न सह सका और उन्हें धरती पर रखकर अपने पशुओं को चराने चला गया। इस तरह दोनों शिवलिंग वहीं स्थापित हो गए।

कोशिश बहुत की मगर रावण दोबारा नहीं उठा पाया शिवलिंग 

कोशिश बहुत की मगर रावण दोबारा नहीं उठा पाया शिवलिंग 

वह उसे उठाने लगा लेकिन उठा नहीं पाया। काफी कोशिश करने के बाद भी शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ। रावण शिव महिमा को जान गया और वहीं मंदिर का निर्माण करवा दिया। और खाली हाथ लंका लौट आया।

पांडव नहीं बना पाए थे पूरा मंदिर 

पांडव नहीं बना पाए थे पूरा मंदिर 

द्वापर युग में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर का शेष निर्माण कार्य 'आहुक' एवं 'मनुक' नाम के दो व्यापारियों ने 1204 ई. में पूर्ण किया था और तब से लेकर अब तक यह स्थान 'शिवधाम' के नाम से उत्तरी भारत में प्रसिद्ध है।

आप सभी को लोकेन्द्र शर्मा और पुरे Wittyfeed परिवार की ओर से दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।  


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