Share this post

user icon

Live

People Reading

This story now

एक ऐसी रामलीला जो आपने ना कभी देखी होगी और ना ही कभी सुनी होगी

अंत होगा रावण का, विजय रथ निकलेगा श्री राम का। बुराई पर फिर होगी अच्छाई की जीत। रंगमंच फिर तैयार होगा इस दशहरा। बस रामलीला का अंदाज़ थोड़ा अलग होगा। जय श्री राम।

हर साल हम दशहरा का पवन त्यौहार मनाते हैं। हर साल हम रामलीला देखते हैं। इस बार भी हम वो ही करेंगे? सवाल में ही जवाब है, बस समझने की ज़रूरत है। फिर भी जिसको समझ ना आया तो कह देता हूँ। मेरा तो जवाब है 'ना' और आपका?

चलिए, इस बार हम आपको उत्तराखंड के पौड़ी की ऐतिहासिक रामलीला की सैर कराते हैं जिसको देख कर आपका मन भी कह उठेगा 'जय श्री राम'।
एक ऐसी रामलीला, जिसकी गूंज दुनिया के हर कोने में सुनाई देती है लेकिन वो अपने खुद के देश में अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। यूनेस्को तक ने इस रामलीला की प्रशंसा की है। आख़िर, क्या खास बात
है इस 119 वर्ष पुरानी रामलीला की? आइये यह जानने की कोशिश करते है। 

एक ऐसी रामलीला जो आपने ना कभी देखी होगी और ना ही कभी सुनी होगी

एक ऐसी रामलीला जो आपने ना कभी देखी होगी और ना ही कभी सुनी होगी

754 396
  in Desi

यहाँ महिला का किरदार पुरूष के बजाय महिलाएँ ही निभा रहीं हैं

यहाँ महिला का किरदार पुरूष के बजाय महिलाएँ ही निभा रहीं हैं

रामलीला कमेटी ने वर्ष 2000 में महिला किरदार के लिए महिलाओं को ही शामिल करने का एहम निर्णय लिया।

रामलीला की शुरुआत वर्ष 1897 में हुई थी

रामलीला की शुरुआत वर्ष 1897 में हुई थी

रामलीला की शुरुआत वर्ष 1897 में कांडई गांव से हुई थी। तब गांव में ही रामलीला मंचन किया जाता था।

लकड़ी जला कर हुई थी शुरुआत, आज विद्युत बल्ब शान है इस रामलीला की

लकड़ी जला कर हुई थी शुरुआत, आज विद्युत बल्ब शान है इस रामलीला की

शुरुआत के दिनों में भीमल के पेड़ की लकड़ियां को जलाकर रात भर रामलीला का मंचन किया जाता था। समय बदलता गया और रामलीला के आयोजन का तौर-तरीका भी बदलता गया। 1930 में पहली बार लालटेन की रोशनी उपयोग में लाइ गई और 1960 के बाद से विद्युत बल्ब इस रामलीला के मंचन की शान बढ़ा रहे हैं। इस तरह पौड़ी की रामलीला में कई प्रकार के उतार-चढ़ाव आते रहे, लेकिन फिर भी हर साल उतनी ही श्रद्घा व उल्लास के साथ रामलीला को मनाया गया।

दो साल तक नहीं किया जा सका था रामलीला का मंचन

दो साल तक नहीं किया जा सका था रामलीला का मंचन

नब्बे के दशक में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान दो साल तक रामलीला का आयोजन नहीं हो पाया था। उस वक़्त अधिकांश रंगकर्मी खुद आंदोलन से जुड़ गए थे, जिसके कारण मंचन नहीं किया जा सका था। लेकिन उसके बाद से आजतक यहाँ हर वर्ष दस दिनों का रामलीला मंचन होता आया है।

इस बार की रामलीला में है कुछ खास बात

इस बार की रामलीला में है कुछ खास बात

'देव भूमि' उत्तराखंड में बसी है पर्यटन नगरी पौड़ी, जहाँ 1 अक्टूबर से रामलीला मंचन शुरू हो जाता है। इस बार मंचन का उद्घाटन कारगिल शहीद कुलदीप सिंह की माता कमला देवी ने किया। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष आशुतोष नेगी ने बताया कि इस बार रामलीला का मंचन कुछ अलग अंदाज़ में किया जा रहा है। इसमें क्या है ख़ास यह देखने के लिए आपको खुद पौड़ी जाना पड़ेगा। तो अपने बैग तैयार रखें और ऐतिहासिक रामलीला का हिस्सा बनकर अपने जीवन को नई दिशा दें।

हर साल हज़ारो विदेशी पर्यटक पधारते हैं पौड़ी में

हर साल हज़ारो विदेशी पर्यटक पधारते हैं पौड़ी में

पर्यटन नगरी पौड़ी सिर्फ अपनी रामलीला के लिए जग प्रसिद्ध नहीं है। यहाँ की वादियों का भी अपना ही एक अलग मज़ा है जिसके कारण विदेशी पर्यटक यहाँ खिंचे चले आते हैं।

दशहरे के पावन अवसर पर आपको एवं आपके परिवार को 'विटीफीड' की ओर से हार्दिक शुभकामनायें, जय श्री राम

दशहरे के पावन अवसर पर आपको एवं आपके परिवार को 'विटीफीड' की ओर से हार्दिक शुभकामनायें, जय श्री राम

Loved this? Spread it out then

comments Comment ()

Post as @guest useror
clear

clear
arrow_back

redo Pooja query_builder {{childComment.timeAgo}}

clear

clear
arrow_back

Be the first to comment on this story.

Report

close

Select you are Reporting

expand_more
  • +2351 Active user
Post as @guest useror

NSFW Content Ahead

To access this content, confirm your age by signing up.