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हम सब चलती-फिरती लाश हैं! मैं नहीं ये तस्वीरें बोल रही हैं

यूं तो हम सब खुद को सभ्य समाज का हिस्सा बताते हैं। एक समाज जो व्यवस्था से चल रहा है। वो व्यवस्था जो सबके लिए एक सी नहीं है। खोट यहां व्यवस्था में नहीं है, हमारे अंदर है जिससे ये व्यवस्था बनी है। फिलहाल तो वक्त ऐसा है कि दिन ब दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं। जिससे लगता है कि हम सब वो लाश हैं जो सिस्टम के कंधे पर ले जाई जा रही है।

आईए जानते हैं हाल ही की कुछ ऐसी ही घटनाओं के बारे में जिसे पढ़कर आप भी बिल्कुल ऐसा ही सोचेंगे।

हम सब चलती-फिरती लाश हैं! मैं नहीं ये तस्वीरें बोल रही हैं

हम सब चलती-फिरती लाश हैं! मैं नहीं ये तस्वीरें बोल रही हैं

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1. रिम्स अस्पताल, रांची, झारखंड 

1.	रिम्स अस्पताल, रांची, झारखंड 

ये तस्वीरें एक बीमार महिला की हैं। इनके हाथ पर प्लास्टर बंधा हैं। भूख से बेबस इस महिला को रांची के मशहूर अस्पताल रिम्स के कर्मचारियों ने फर्श पर ही खाना परोस दिया। खबरों के मुताबिक ऐसा इस महिला के साथ पहले भी किया गया था। जरा सोचिए इस तस्वीर को देखकर ही रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं, लेकिन जब कर्मचारियों ने इन्हें फर्श पर खाना दिया तो उनके हाथ बिल्कुल नहीं कांपे, दिल जरा सा भी नहीं पसीजा, क्योंकि लाश के सीने में दिल तो होता है, लेकिन मरा हुआ।

 ये तस्वीरें बोलती हैं

 ये तस्वीरें बोलती हैं

मीडिया और सोशल मीडिया में खबरों के आने के बाद अब कार्यवाही तो हो रही है लेकिन ये तस्वीर सिर्फ इस महिला की कहानी नहीं है। ये कहानी है हमारे सिस्टम की।

2. कालाहांडी, ओडिशा

2. कालाहांडी, ओडिशा

अपनी पत्नी की लाश अपने कंधे पर ढो रहे ये हैं दाना मांझी। बेहद गरीब आदिवासी क़बीले से आने वाले दाना मांझी की ये तस्वीरे ही सब कुछ बयां कर रही है। मांझी की पत्नी की मौत टीबी से हुई, पैसे नहीं होने के कारण अस्पताल ने इन्हें एंबुलेंस नहीं दिया।

 बीवी के शव को उठाते दाना मांझी

 बीवी के शव को उठाते दाना मांझी

जिसके बाद अपनी पत्नी के शव को दाना ने कपड़े में लपेट कर करीब 12 किलोमीटर का सफर तय किया।

 अब भी कहेंगे कि हम जिंदा हैं?

 अब भी कहेंगे कि हम जिंदा हैं?

इस दौरान दाना की हमसफर थी उनकी 12 साल की बिलखती हुई बेटी। क्या अब भी आप कहेंगे कि हम जिंदा हैं!

3. बालासोर, ओडिशा

3. बालासोर, ओडिशा

ये तस्वीर भी ओडिशा की है। ये शख्स अपने पैर से एक महिला के शव की हड्डियों को तोड़ रहा है। जिससे वो शव को आसानी से गठरी में बांध सके।

 बांस पर शव लटकाकर ले जाते लोग

 बांस पर शव लटकाकर ले जाते लोग

शव की हड्डियों को तोड़ा गया एवं गठरी में बांधकर बांस से लटकाकर अस्पताल पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया। इस दौरान मृतक महिला का जवान बेटा वहीं था। लेकिन वो कुछ ना कर सका, क्योंकि उसके पास शव को ऑटो से ले जाने के पैसे तक नहीं थे। क्या अब और कुछ कहना है?

4. कानपुर, उत्तर प्रदेश

4. कानपुर, उत्तर प्रदेश

आइये आपको इनसे मिलाते हैं। ये हैं सुनील कुमार, इनका 12 साल का बेटा था अंश। सुनील के मुताबिक अंश को तेज बुखार हुआ तो वो अंश को लेकर हैलेट अस्पताल (स्थानीय सरकारी अस्पताल) पहुंचे। अस्पताल में उन्हें कहा गया कि बाल स्वास्थ्य केंद्र लेकर जाओ, सुनील के मुताबिक उन्हें स्ट्रेचर भी नहीं दिया गया।

 कंधे पर बीमार बेटे को ले जाते सुनील कुमार

 कंधे पर बीमार बेटे को ले जाते सुनील कुमार

कंधे पर ही उनके आंख के तारे अंश की मौत हो गई। ये बुखार से मौत है या सिस्टम ने अंश की हत्या की आप खुद सोच सकते हैं।

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