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मेरे कपड़ों से मेरे किरदार का फैसला होता है यहाँ, हाँ मैं औरत हूँ 

जो सच कहूँगी तो आप बुरा मान जाएंगे तो चलिए मैं भूल जाती हूँ कि मुझे आपके इस इज़्ज़तदार समाज की बातें अंदर से खोखला कर देती हैं। मैं यह भी भूल जाती हूँ कि दर्द की जितनी भी गाहें मेरे अंदर क्यूँ ना हो, मेरी आवाज़ नहीं निकलनी चाहिए। मुझे नीची मुंडी डाले निकल जाना चाहिये, फिर कोई ताने कसे या सीटियाँ बजाए। मैं ही माँ बनकर घर की ज़ीनत बढ़ाती हूँ, और आज कल यह समाज मुझे नौकरी की इजाज़त भी दे देता है। और मैं ही वो औरत हूँ जो बहु बनकर अपना घर चलाना भी जानती हूँ, और मेरी मर्ज़ी हो या ना हो मुझे मेरे पति की इच्छाओं का ख़्याल भी रखना है। 

मेरे कपड़ों से मेरा किरदार टटोला जाता है। मैं बच्चा ना दे पाई तो "बाँझ" कहलाती हूँ और लड़की पैदा हो भी गई तो मैं "अभागी" हो जाती हूँ। मेरी थकन तो पेशानी पर पड़े बलों में ही उलझ जाती है, और पति की थकन के लिए रात काफी है। दुर्गा और लक्ष्मी भी मैं ही हूँ। "वेश्या" से भी जाना जाता है मुझे। हाँ! मैं औरत हूँ 

हाँ मैं औरत हूँ!

बिस्तर पर पड़ी सिलवटें 

गवाह है मेरे दर्द की। 

मुझे घर के काम नहीं,

इंसानो के रवैये थका देते हैं। 

मैं ज़िन्दगी गुज़ारती तो हूँ, 

लेकिन जीना छोड़ चुकी हूँ। 

मैं उस दुनिया की औरत हूँ 

जहाँ तुम मुझे पूजते तो हो 

लेकिन उसी देवी का 

चीर हरण भी तुम ही करते हो। 

हाँ मैं औरत हूँ !

मेरे कपड़ों से मेरे किरदार का फैसला होता है यहाँ, हाँ मैं औरत हूँ 

मेरे कपड़ों से मेरे किरदार का फैसला होता है यहाँ, हाँ मैं औरत हूँ 

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मेरा मासूम बचपन अब भी तरसता है खिलखिलाने को..

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मैंने बचपन में गुड्डे-गुड़िया का ब्याह रचाया था और अब मैं भी ब्याहता हूँ। 

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ममता तो नारी का ही रूप है, फिर मैं बाँझ कैसे हो गई?

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क्या मेरी पीड़ा किसी को दिखाई नहीं देती?

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जन्मा तो मैंने कोख़ से है, क्या तुम उस कोख़ पर भी शर्मिंदा हो?

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क्या मेरी दुनिया सफ़ेद रंग तक ही सीमित है?

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क्या मेरी कोई निजी इच्छाएँ नहीं हैं  ?

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चरित्रहीन सिर्फ़ औरत ही है क्या?

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और फिर मेरी कहानी इस तरह भी ख़त्म कर दी जाती है। 

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हाँ! मैं औरत हूँ 

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