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बेटे की मौत पर पिता का खत, चाहिये केवल इन्साफ 

"किसी गलत कृत्य को देख चुप रहना बहुत ही क्रूर है, परंतु उस पर निष्क्रियता उससे भी अधिक दुःखदायी है। यही मेरे साथ हुआ है।" - एक 'पिता'

यह शब्द हैं एक ऐसे पिता के जिन्होनें हाल ही में अपने युवा बेटे को एक दर्दनाक हादसे में खोया है। विडम्बना यह है कि यह घटना केवल एक हादसा ही है या फिर हादसे के रूप में ढाली गई कोई साजिश, इस बात पर से पर्दा उठाने के लिए इसी 'पिता' को हमारी क़ानून व्यवस्था के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

यह घटना जुड़ी है चेन्नई में रहने वाले असम के एक युवा से, जिसे संगीत के क्षेत्र में कुछ करने की चाहत थी। परंतु काल की धुन के आगे वह कुछ सुन ना सका, और अब प्रशासन इस मामले में कुछ सुनना नहीं चाहता। यह घटना जुड़ी है हर उस आम इंसान से जिसकी गुहार पुलिस प्रशासन की दहलीज़ में ही कहीं दम तोड़ देती है। 

निलॉय, चेन्नई के 'स्वर्णभूमि म्यूजिक एकेडमी' में पढ़ने वाला एक छात्र जो 4 सितंबर की शाम से लापता था। जिसे यह पिता सारी कोशिशें करते हुए ढूंढने में लगा हुआ था। परंतु एक पिता की आँखें भी उस वक्त पत्थर में तब्दील हो गई जब 6 सितंबर के दिन उन आँखों के सामने उसके अपने 'अंश' का बेजान शरीर पड़ा हुआ था।

"उजाले की कीमत उसे ही समझ आती है जिसका अपना चिराग बुझ गया हो" परंतु यह दुःख उस समय और भी बढ़ जाता है जब उस चिराग के बुझने की वजह के प्रति भी यह तंत्र संवेदनशील ना हो सके। यदि हमारी सामाजिक एवं क़ानून व्यवस्था एक पिता के टूट चुके सपनों के प्रति भी अपनी संवेदना नहीं दिखा सकती तो शायद आज हमें अपनी मानव सभ्यता के ऊपर फिर से विचार विमर्श करने की जरुरत है। 

एक 'पिता' के इस खत को आपके सामने रखते हुए मैं केवल एक ही उम्मीद करता हूँ कि शायद आपके पास एक 'इंसानी' दिल कहीं ज़िंदा हो ताकि आप इस तकलीफ को समझते हुए अपने तरफ से समर्थन का एक हाथ बढ़ा सकें। क्योंकि इन्साफ की लड़ाई में अक्सर दूसरों का साथ ही सबसे बड़ी ताकत बनती है।

आइये आगे पढ़ते हैं वह खत जिसमे लिखी है सच्चाई -

बेटे की मौत पर पिता का खत, चाहिये केवल इन्साफ 

बेटे की मौत पर पिता का खत, चाहिये केवल इन्साफ 

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खो गए तुम ऐसे कि मैं ढूंढ ही ना सका। 

खो गए तुम ऐसे कि मैं ढूंढ ही ना सका। 

असम के रहने वाले निलॉय की गुमशुदगी के बारे में आइये जानते हैं सारा घटनाक्रम उनके पिता के शब्दों में, "महाबलीपुरम, तमिलनाडु स्थित ब्लू बे रिसॉर्ट में आयोजित एक पार्टी में शामिल होने गए 42 बच्चों में निलॉय भी शामिल था। उनके साथ स्वर्णभूमि म्यूजिक एकेडमी के 7 शिक्षक भी मौजूद थे। हमें 4 सितंबर को देर रात 11:40 बजे कॉलेज प्रबंधन से निलॉय की गुमशुदगी के बारे में फोन कर जानकारी देते हुए बताया गया कि मेरा बेटा 4 सितंबर की शाम 6:30 बजे से लापता है। यह खबर पाते ही मैंने अपने बड़े बेटे के साथ तुरंत ही महाबलीपुरम के लिए उड़ान भरी। सावधानी बरतते हुए मैंने महाबलीपुरम में मौजूद कुछ पहचान वालों को मदद करने हेतु मामले से अवगत करवा दिया था, जो 4 सितंबर की रात 2:30 बजे कॉलेज परिसर पहुँच गए थे। वहाँ पहुँचने पर मैंने अपने बेटे की खोजबीन करते हुए जब पूछताछ की तो सबसे अलग-अलग जवाब सुनने के लिए मिले। उन जवाबों से कई में विसंगति थी।"

ऐसी निष्ठुरता कि कॉलेज के अंदर प्रवेश तक ना मिला।

ऐसी निष्ठुरता कि कॉलेज के अंदर प्रवेश तक ना मिला।

"कॉलेज जल्दी पहुँच चुके उसके कुछ दोस्तों या मुझसे कॉलेज प्रशासन ने कोई भी बात नहीं की। यहाँ तक कि 'गुमशुदा बच्चे के पिता' मतलब मुझे अपने बच्चे को ढूंढने के लिए उस पार्टी में से वापस आ चुके अध्यापकों या अन्य बच्चों से मिलने या कॉलेज परिसर में प्रवेश करने की अनुमति तक नहीं दी गई।

मेरे बच्चे को ढूंढने के लिहाज से हर जानकारी महत्वपूर्ण थी, परंतु हमें कॉलेज प्रशासन की तरफ से कोई भी मदद नहीं मिली। बात एक ऐसे बच्चे की है जो आपकी देख-रेख में से गायब हुआ है। कॉलेज प्रशासन के इस रवैये से मेरे बेटे के मिलने की सारी उम्मीदें गर्त में समाती हुई दिख रहीं थी।"

गुमशुदा का पिता होने के नाते मुझे सीसीटीवी फुटेज देखने का हक़ भी नहीं।

गुमशुदा का पिता होने के नाते मुझे सीसीटीवी फुटेज देखने का हक़ भी नहीं।

"कॉलेज प्रशासन की उदासीनता के अलावा एक बात और जो मुझे डरा रही थी वह पुलिस की निष्क्रियता थी। आलम यह था कि मेरे शरीर का अंश खो जाने के बावजूद मुझे उस रिसॉर्ट के सीसीटीवी फुटेज को देखने का हक़ भी ना दिया गया।"

उस एक कॉल से टूट गई सारी उम्मीदें।

उस एक कॉल से टूट गई सारी उम्मीदें।

आखिरकार 6 सितंबर को पुलिस की तरफ से ऐसा फोन कॉल आया जिसे शायद निलॉय के पिता कभी उठाना नहीं चाहते थे। फोन में उन्हें उनके बेटे के मिलने की खबर सुनाई गई। पर वह बेटा तो अब तक मुँह मोड़ चुका था। 

"एक बेटे की मौत से एक पिता भी मरता है।" और शायद इस पल के साथ ही एक और पिता अपनी ज़िंदगी हार चुका था। 

पुलिस दे रही इसे आत्महत्या की शक़्ल।

पुलिस दे रही इसे आत्महत्या की शक़्ल।

किसी इंसान की सारी दुनिया उजड़ने पर उसके पास बचती है तो सिर्फ 'उम्मीद'।  और यदि उस टूट चुके इंसान से उसकी उम्मीद भी छीन ली जाए तो वह इंसान केवल एक हाड़-मांस का पुतला बन कर रह जाता है। अपना बेटा खोने के बाद निलॉय के पिता वैसे ही अपनी सुध-बुध खो बैठे हैं। उन्हें ज़िंदा रखी हुई है तो केवल एक 'उम्मीद', उम्मीद इन्साफ की। उम्मीद, अपने बेटे से जुड़े सच का पता लगाने की। परंतु पुलिस प्रशासन उनकी इस उम्मीद की लौ भी बुझाने पर तुला हुआ है। 

पुलिस ने इस मामले में निलॉय की मौत को संदिग्ध अवस्था में हुई मौत तो माना, पर साथ ही इसे आत्महत्या का मामला भी करार दे दिया गया। पुलिस की उदासीनता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस द्वारा जारी किये गए 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' में सुबह 8:30 बजे मिले शव को दोपहर 1:30 बजे मिलना बताया गया है। 

मेरे बेटे ने नहीं की है आत्महत्या।

मेरे बेटे ने नहीं की है आत्महत्या।

निलॉय के पिता ने इस सारे घटनाक्रम के बाद अपनी व्यथा सुनाते हुए साफ़ तौर पर कहा कि 'मेरे बेटे ने आत्महत्या नहीं की है।' इस मामले के सभी तथ्यों पर गौर करने के बाद यह बात साफ़ तौर पर कही जा सकती है कि निलॉय सेनगुप्ता की मौत बेशक़ ही बेहद संदिग्ध अवस्था में हुई है। स्पष्ट तौर पर इस मामले में निष्पक्ष जाँच किये जाने की आवश्यकता है। परंतु आँखों में पट्टी बाँध बैठी पुलिस को यह बात शायद दिखाई नहीं दे रही है।

पुलिस की असंवेदनशीलता एवं मामले के प्रति निष्ठुरता का आलम यह था कि जब पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने की कोशिश की गई तो गुमशुदगी के 12 घंटे पूरे ना होने का हवाला देकर इसे नजरअंदाज कर दिया गया। इसी तरह कोस्ट गार्ड ने भी शिकायत दर्ज ना होने के कारण मदद करने से इंकार कर दिया था। 

कॉलेज प्रशासन की भूमिका भी संदिग्ध।

कॉलेज प्रशासन की भूमिका भी संदिग्ध।

इस पूरे मामले में एक बात जो गौर करने लायक है वह है कॉलेज प्रशासन की भूमिका। निलॉय की गुमशुदगी कॉलेज की देखरेख वाले कार्यक्रम में से हुई थी। जिसके लिए सीधे तौर पर प्रशासन जवाबदेह है। निलॉय को ढूंढने की कोशिशों पर सवाल उठाये जा रहे हैं। निलॉय का शव कथित रिसॉर्ट से 100 मीटर के दायरे में समुद्र के किनारे पड़ा हुआ मिला था। यह वही इलाका है जिसकी छानबीन कॉलेज के अध्यापकों एवं अन्य छात्रों के द्वारा की जानी बताई जा रही है। 

इसके अतिरिक्त कॉलेज प्रशासन के द्वारा पुलिस में शिकायत भी गुमशुदगी के 15.5 घंटों बाद दर्ज करवाई गई थी। 

चोट के यह निशान आत्महत्या के खिलाफ दे रहे हैं बयान।

चोट के यह निशान आत्महत्या के खिलाफ दे रहे हैं बयान।

निलॉय के शरीर पर दिख रहे चोट के निशान इस मामले में पुलिस के लगाए अनुमान से इत्तेफ़ाक रखते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। निलॉय के सिर एवं गर्दन में चोट के ताजा निशान पुलिस के आत्महत्या वाले दावे को पूरी तरह झुठला रहे हैं। इसके अलावा निलॉय की जाँघों व कन्धों में जलने के निशान भी पाए गए हैं। जिसके बारे में पुलिस या कॉलेज प्रशासन कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दे पा रहे है। पुलिस के पास तो इस बात का भी जवाब नहीं है कि निलॉय ने यदि आत्महत्या की है तो उसके शरीर के कपड़े कहाँ गए?

और भी हैं सवाल। 

और भी हैं सवाल। 

पुलिस के पास इस बात का भी जवाब नहीं है कि "निलॉय ने यदि आत्महत्या की है तो उसके शरीर के कपड़े कहाँ गए?"

इसके अलावा एक तथ्य यह भी है कि यदि शरीर 2 दिनों तक पानी के अंदर था (जैसा की बताया जा रहा है ) तो शरीर के सभी अंग फूले हुए होने थे। परंतु इसके विपरीत केवल शरीर के धड़ से ऊपर का हिस्सा ही असामान्य रूप से फूला हुआ है। यह सभी बातें किसी अनहोनी की तरफ ही इशारा कर रही हैं। 

अंत में एक पिता की अपील। 

अंत में एक पिता की अपील। 

"मुझ जैसे अभागे पिता का दर्द शब्दों से कम नहीं हो सकता, कोई भी शब्द निलॉय को वापस नहीं ला सकते हैं। मैं आप सभी से निवेदन करता हूँ कि कृपया निलॉय को इन्साफ दिलाने में मेरा साथ दीजिये। निलॉय, एक बच्चा जो मन में संगीत की उमंग लिए चेन्नई आया था पर अब कफ़न में लिपटा हुआ वापस जा रहा है। 

यह बात स्पष्ट है कि पुलिस किसी वजह से इस मामले में निष्पक्ष जांच नहीं कर रही है। एक पिता होने के नाते मैं आप सभी से अनुरोध करता हूँ कि इन हालातों में मेरा साथ दें एवं इस मामले की जांच सीबीआई के द्वारा करवाये जाने का हरसंभव प्रयास करें। इन्साफ मेरे और मेरे बेटे के लिए उम्मीद की उस आखिरी किरण की तरह है जिस तक पहुँच कर ही मेरी ज़िन्दगी पूरी हो पाएगी। 

मुझे इस मामले में आप सभी के साथ बहुत उम्मीद है।" -  एक 'पिता'

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