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कभी थे रघुराम राजन के शिक्षक आज आदिवासियों की जीवनशैली बदल रहे हैं

लाखो छात्र आई आई टी की परीक्षा के लिए तैयारी करते है क्योंकि हमारे यह मान्यता है की अगर आपको आई आई टी कॉलेज मिल गया मतलब आपकी "लाइफ सेट" पर एक आईआईटीयन ऐसे भी हैं जो पिछड़े इलाके में रहकर आदिवासयों की जीवनशैली में बदलाव लाने का काम कर रहे हैं और उनका नाम है,अलोक सागर।

आइये जानते है इनकी पूरी कहानी -

कभी थे रघुराम राजन के शिक्षक आज आदिवासियों की जीवनशैली बदल रहे हैं

कभी थे रघुराम राजन के शिक्षक आज आदिवासियों की जीवनशैली बदल रहे हैं

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रघुराम राजन भी इनके छात्र थे।

रघुराम राजन भी इनके छात्र थे।

आलोक जी का जन्म 20 जनवरी 1950 को दिल्ली में हुआ था उन्होंने 1966-71 मतक आईआईटी दिल्ली से बी.टेक किया और फिर वही से 1971-73 में एम.टेक की डिग्री पूरी करी उसके बाद वो पी.एचडी करने के लिए राइज यूनिवर्सिटी ह्यूस्टन चले गए पी.एचडी करने के बाद करीब डेढ़ साल तक यूएस में जॉब करी पर आखिर देश की मिट्टी की खुशबू इन्हें वापिस भारत ले आई वहां से आने के बाद एक साल तक आईआईटी दिल्ली में पढाया उसी दौरान इन्होंने पूर्व आर बी आई गवर्नर रघुराम राजन को भी पढाया था।

बेतुल जिले के कोचामू नाम के गाँव में रहते हैं।

बेतुल जिले के कोचामू नाम के गाँव में रहते हैं।

करीब 90 के दशक में आदिवासी श्रमिक संघठन के अपने साथियों के साथ मध्य प्रदेश आ गए थे,आलोक जी फ़िलहाल कोचामू नामक गाँव जो की मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 165 किलोमीटर दूरी पर स्थित है, यही इनका ठिकाना है। 750 की जनसँख्या वाले इस गाँव में मुलभुत सुविधा के नाम पर ना ही बिजली है और ना पक्की सड़क, शिक्षा के लिए सिर्फ एक प्राइमरी विद्यालय है।

एक सक्षम परिवार के बेटे हैं आलोक सागर 

एक सक्षम परिवार के बेटे हैं आलोक सागर 

आलोक एक शभ्रांत परिवार से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति हैं। इनके पिताजी इंडियन रेवेन्यु सर्विस में अधिकारी थे, माताजी फिजिक्स की प्रोफेसर थी और छोटे भाई आज भी आईआईटी में प्रोफेसर है इन सबके बावजूद भी आज आलोक अपनी शैक्षणिक उपलब्धिया छुपाकर एक आम इंसान की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं। 

सिर्फ तीन कुर्ते और एक साइकिल है इनके पास 

सिर्फ तीन कुर्ते और एक साइकिल है इनके पास 

आलोक अपना जीवन बड़े ही सादे तरीके से बीताते हैं उनके पास सिर्फ एक साइकिल है, रबर की चप्पले और तीन जोड़ी कुर्ते। इन्‍हें कई भाषाएं बोलनी आती है, लेकिन वेषभूषा एक सामान्य आदिवासी की तरह है । आज भी पुरे गाँव में ये अपनी पुरानी साइकिल पर घुमते है।

 


ये घांस फूस की झोंपड़ी है इनका घर

ये घांस फूस की झोंपड़ी है इनका घर

एक तरफ दुनिया आलीशान घर खरीदने के लिए पागल है इसी के उलट आलोक जी किसी साधू संत की तरह कुटिया में रहते है। कोई सपने में भी नहीं सोच सकता की आईआईटी से पास व्यक्ति झोंपड़ी में रहता होगा लेकिन यह सच्चाई है इस फोटो में जो झोंपड़ी दिखाई दे रही है यही आलोक जी का घर है पिछले कई सालो से आलोक जी इसी घर में रह रहे है। 

संदिग्ध समझकर पुलिस ने इन्हें थाने बुला लिया था 

संदिग्ध समझकर पुलिस ने इन्हें थाने बुला लिया था 

गाँव में जाने के बाद से इन्होने अपनी साड़ी डिग्रीयों को एक संदूक में बंद करके रख दिया था, परन्तु कुछ दिन पहले बेतुल के उपचुनाव के दौरान पुलिस ने इन्हें संदिग्ध व्यक्ति समझ कर थाने बुला लिया था, पूछताछ के दौरान जब इन्होने अपनी शैक्षणिक योग्यता बताई तब पुलिस के अधिकारी भी हैरान रह गए थे। 

अपनी पहचान छुपाकर रहते है 

अपनी पहचान छुपाकर रहते है 

कोई आम व्यक्ति 12 वी में थोड़े अच्छे अंक भी ले आता है तो पुरे गाँव में ढोल पीट देता है दूसरी और आलोक जी एक प्रतिष्ठित संस्थान से पास होते हुए भी अपनी पहचान छुपाकर गाँव में लोगो के साथ मिल-जुल कर रहते है। इनका मानना है की मैं अपनी डिग्रीयां इसलिए नहीं दिखाता, ताकि आम लोगो के बीच काम कर सकूं। 

गाँव में लोगो के जीवन को दे रहे है नई दिशा 

गाँव में लोगो के जीवन को दे रहे है नई दिशा 

आलोक ने यहाँ करीब 50000 से ज्यादा पौधे लगाए है, साथ ही फलदार पौधे लगाकर गान में लोगो को गरीबी से लड़ने में मदद कर रहे है। गाँव में लोगो की मदद करना और बच्चो को शिक्षा प्रदान करना इनकी दिनचर्या में शामिल है।इनका कहना है की बड़ी बड़ी बाते करने से ज्यादा जरुरी जमीन पर आकर काम करना ज्यादा जरुरी है, आलोक जी ने कहा की भारत में लोग कई तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे है ,मगर हर कोई अपनी डिग्री दिखाकर अपनी योग्यता साबित करने में लगा है।

आलोक सागर जी का मूल मंत्र है "सादा जीवन उच्च विचार" वाकई इनकी कहानी हम सबके लिए बहुत ही बड़ी प्रेरणादायक है।


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