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हँसती खिलखिलाती थी वो... और अब डरी हुई सी रहती है  

अगर भारत की मातृभाषा हिंदी नहीं है।

तो सुहागन के भाल पर बिंदी नहीं है।

क्यों बढ़ी आज इस देश में अंग्रेजियत,

जबकि हिंदुस्तान अब बंदी नहीं है।

अपने ही घर में आज हमने अपनी ही हिंदी की क्या हालत बना दी है। हमने अपने आस-पास एक ऐसा समाज बना दिया है जहाँ पर हिंदी बोलना शर्म समझा जाता है।

ऐसे खौफ में पलती हिंदी क्या सोचती है? सुनते हैं हिंदी की कहानी, उसी की ज़ुबानी...

हँसती खिलखिलाती थी वो... और अब डरी हुई सी रहती है  

हँसती खिलखिलाती थी वो... और अब डरी हुई सी रहती है  

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  in People

मैं डर गई...

मैं डर गई...

सुबह जब बच्चे नाश्ते की टेबल पर आए 

खिलखिलाती मुस्कान से "Good Morning" कहे

और "मैं डर गई।"

हर दिन यह डर बढ़ता गया।

हर दिन यह डर बढ़ता गया।

अख़बार खुला 

ख़बरें तो रोज़ जैसे ही थी 

लेकिन अख़बार देखकर 

"मैं डर गई।"

क्या थी वजह मैं समझ न सकी।

क्या थी वजह मैं समझ न सकी।

सब अपने कामों में लग गए 

मैंने फुरसत के वक़्त 

टी.वी. चालू की ही थी और 

"मैं डर गई।"

मैं डर रही थी किसी अनजान के बढ़ते दख़लअंदाज़ी से।

मैं डर रही थी किसी अनजान के बढ़ते दख़लअंदाज़ी से।

फिर फ़ोन बजा 

कोई अपना ही था 

हँसते  खिलखिलाते

बात तो हो गई लेकिन 

"मैं डर गई।" 

परन्तु क्या मेरा डर सही था?

परन्तु क्या मेरा डर सही था?

फिर शाम तक सब घर लौटे 

अपने "Android" फ़ोन पर 

नज़रें गड़ाए हुए और 

"मैं डर गई।"  

मेरा डर वाज़िब ही तो था। 

मेरा डर वाज़िब ही तो था। 

आखिर ऐसी कौन सी हवा का ये असर है की हम अपने आप को इस कदर बदलने में लग गए की सही गलत में फर्क समझना ही भूल गए।

मैं कुछ खोज रही थी।

मैं कुछ खोज रही थी।

मैं "Good Morning" की जगह 

अपने आप को ढूँढ रही थी 

प्रणाम भी तो हो सकता था। 

यह जो भाषा हम आज इस्तमाल कर रहे हैं वह कुछ और भी तो हो सकती थी।

यह जो भाषा हम आज इस्तमाल कर रहे हैं वह कुछ और भी तो हो सकती थी।

अख़बार में

किसी और भाषा की जगह 

मैं अपने आप को 

तलाश कर रही थी। 

वो मधुर स्वर को याद कर रही थी।

वो मधुर स्वर को याद कर रही थी।

दूरदर्शन ना सही लेकिन 

अंग्रेजी में थिरकने की बजाए 

अब कोई मुझे क्यूँ नहीं सुनता। 

मात्र भाषा में हो रही चाशनी सी डूबी हुई बातों को याद कर रही थी।

मात्र भाषा में हो रही चाशनी सी डूबी हुई बातों को याद कर रही थी।

और फ़ोन जो "how are you?" पर शुरू होकर 

"take care" पर ख़त्म हो गया 

उसकी बजाए 

नमस्ते कहकर 

फिर मिलते हैं 

भी तो हो सकता था। 

नई टेक्नोलॉजी में लुप्त हुई अपनी हिंदी को खोज रही थी।

नई टेक्नोलॉजी में लुप्त हुई अपनी हिंदी को खोज रही थी।

और आपके "Android" फ़ोन 

उसमे तो मेरा ज़िक्र ही नहीं था। 

मात्र भाषा का मज़ाक उड़ता देख सीने में 1 कलप सी उठने लगी।

मात्र भाषा का मज़ाक उड़ता देख सीने में 1 कलप सी उठने लगी।

मज़ाक तो तुम मेरा 

बना ही लेते हो 

जब  नाइन वन टू फाइव फाइव (91255)   को

तुम्हारे सामने इन्क्यान्वे दो सौ पचपन 

कह दे कोई। 

'अ से ज्ञ' की पढाई को ऐसा बिसराया की दूर-दूर तक इसका नामों निशान नहीं रहा।

'अ से ज्ञ' की पढाई को ऐसा बिसराया की दूर-दूर तक इसका नामों निशान नहीं रहा।

'A to Z' तो तुमने 3 साल की उम्र में ही रट्ट ली थी।

शब्दों को टटोलना कभी 'अ से ज्ञ' के बीच,

उनमें मैं बसती हूँ। 

अपने लुप्त हुए अस्तित्व को तलाशती "मैं"।

अपने लुप्त हुए अस्तित्व को तलाशती

जिनको पहचान दी मैंने 

उन्हीं से पहचान पाने के लिए 

अपने अस्तित्व को तलाशती 

"मैं हिन्दी। "

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