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वो अदभुत 15 पल जब जिंदगी मौत पर भारी पड़ी

"जिंदगी और मौत तो उपरवाले के हाथ में है जंहापना, जिसे न आप बदल सकते है न मैं, हम सब तो रंगमंच की कटपुतलियाँ है, जिसकी डोर उपरवाले के हाथ बंधी है, कब कौन कैसे उठेगा ये कोई नहीं जानता?"

मैं जानता हूँ, आज भी आप जब आनंद मूवी में राजेश खन्ना का यह डायलॉग सुनते हैं, तो खुद को ताली बजाने से रोक नहीं पाते।

मगर आज राजेश खन्ना साहब की इस बात को सच करके बताते हैं।


वो अदभुत 15 पल जब जिंदगी मौत पर भारी पड़ी

वो अदभुत 15 पल जब जिंदगी मौत पर भारी पड़ी

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1. मलबे से 8 दिन बाद जिंदा निकला 105 साल का शख्स

1. मलबे से 8 दिन बाद जिंदा निकला 105 साल का शख्स

नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप ने हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया, लेकिन इस बीच कई जिंदगियों ने मौत को करीब से मात दी। ऐसे ही एक 105 साल के वृद्ध व्यक्ति को प्रलयंकारी भूकंप आने के आठ दिन बाद रविवार को जीवित बचा लिया गया, यह अपने आप में एक चमत्कार ही है।

2. जब जिन्दा रहने के लिए अपने ही साथियों कि लाशों को खाना पड़ा

2. जब जिन्दा रहने के लिए अपने ही साथियों कि लाशों को खाना पड़ा

इतिहास में ऐसी बहुत सी दुर्घटनाएं हुई है जिसमें जिन्दा बचे लोगों को जिन्दा रहने के लिए बहुत ही विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा हैं। ऐसा ही एक हादसा 1972 में एंडीज के बर्फीले पहाड़ों में हुआ था। जिसमें जिन्दा बचे लोगों को उन बर्फीले पहाड़ों में बिना भोजन के 72 दिनों तक रहना पड़ा था। अपने घायल साथियों को अपनी आखों के सामने मरते देखना पड़ा था। यहां तक कि जिन्दा रहने के लिए अपने ही साथियों कि लाशों को खाना पड़ा था।

3. लांसनायक हनुमनथप्पा बर्फीले दफनों से जूझ कर बाहर जिंदा निकले

3. लांसनायक हनुमनथप्पा बर्फीले दफनों से जूझ कर बाहर जिंदा निकले

सियाचिन में हिमस्खलन से जिन 10 सैनिकों की मौत की खबर आई थी, उनमें से एक सैनिक ने मौत को मात दी। कौन नहीं जानता लांसनायक हनुमनथप्पा को जो उन बर्फीले दफनों से जूझ कर बाहर जिंदा निकले , जहां दो-चार घंटों में ही मौत तय मानी जाती रही है। लेकिन हनुमनथप्पा ने पूरे छह दिन यानी 144 घंटे तक मौत से संघर्ष किया और जिंदा रहे हाँ अस्पताल में उपचार के वक्त उनकी मौत हो गई, मगर उन्होंने जीने के ज़ज्बे को दिखा दिया।

4. डॉक्टर्स ने उन्हें कहा कि वो बस 5 घंटे ही जिंदा रह पाएंगे

4. डॉक्टर्स ने उन्हें कहा कि वो बस 5 घंटे ही जिंदा रह पाएंगे

स्कॉट का शॉर्ट टैम्पर और हाथापाई दूसरों को रास नहीं आती थी। रेसलिंग जगत में उन्हें जब धक्का लगा, जब टीएनए के एक मैच के दौरान स्टाइनर के विरोधी ने उनके गले पर लात मारी। स्टाइनर को खून के साथ खांसी आने लगी। जब उनको डॉक्टर्स के पास ले जाया गया तो डॉक्टर्स ने उन्हें कहा कि वो बस 5 घंटे ही जिंदा रह पाएंगे। स्टाइनर की सांस वाली नली फट गई थी। स्टाइनर 2 हफ्तों तक कोमा में रहे और कुछ ही महीनों बाद मौत को धोखा देते हुए रेसलिंग रिंग में वापिस लौट आए।

5. दी कैंसर को मात 

5. दी कैंसर को मात 

मेरे सामने जिंदगी और मौत में से एक को चुनना था। मैंने फैसला किया कि मैं डर को मात देकर जिंदगी में मिसाल कायम करूंगी। पांच महीने तक कैंसर से लड़ी और आज आप सब लोगों के बीच बिल्कुल ठीक होकर खड़ी हूं। जिद, हौसला और हिम्मत और परिवार का साथ मुझे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बाहर खींच लाया। जब मैं ठीक हो सकती हूं तो आप क्यों नहीं? बस हिम्मत मत हारिए। लड़िए और जीत लीजिए जिंदगी की हर जंग। यह शब्द है अम्बाला में रहने वाली वैभवी कौशल के जिन्होंने कैंसर जैसी भयानक बीमारी से जित हासिल की।

6. 8 फीट चौड़ी और 5 फीट मोटी चट्‌टान को तोड़ बचाई जान

6. 8 फीट चौड़ी और 5 फीट मोटी चट्‌टान को तोड़ बचाई जान

बोरवैलमें गिरी पांच साल की बेटी सुनीता की जिंदगी की चिंता सिर्फ उसके परिवार और प्रशासन को ही नहीं थी। उसकी जिंदगी बचाने के लिए एक हजार लोगों ने लड़ाई लड़ी। जो भी घटनास्थल पर पहुंचा वह सिर्फ खड़ा ही नहीं रहा। हर शख्स ने अपना-अपना योगदान दिया। कोई राहत कर्मियों के लिए पानी के इंतजाम में जुट गया तो कुछ हौसला बढ़ाने में लग गए। सेना, प्रशासन, पुलिस, एनडीआरएफ और लोगों की कोशिश कामयाब हुई। और सुनीता को जिन्दा बचा लिया गया।

7. डॉक्टरों ने 3 बार कहा था डेड, दी हर बार मौत को मात

7. डॉक्टरों ने 3 बार कहा था डेड, दी हर बार मौत को मात

झांसी के खाती बाबा मोहल्ले में रहने वाली सीमा पैर और रीढ़ की हड्डी टूटी होने के बाद भी आज दूसरों का सहारा हैं। एक समय था, जब डॉक्टरों ने उन्हें तीन बार मृत तक घोषित कर दिया था। इसके बाद भी उन्होंने जिंदगी से हार नहीं मानी। आज वह एक सफल एनजीओ चला रही हैं।

8. मौत को एक नहीं बल्कि सात बार मात दी

8. मौत को एक नहीं बल्कि सात बार मात दी

रॉय सी सुलीवेन इस दुनिया में ऎसे इकलौते इंसान है जिन्होंने मौत को एक नहीं बल्कि सात बार मात दी। जी हां, सुलीवेन पर 1942 से लेकर 1977 के बीच में सात बार बिजली गिरी, लेकिन सातों बार ही उनका कुछ नहीं भी बिगड़ा। सुलीवेन के नाम सबसे ज्यादा बार बिजली गिरने वाले इंसान के रूप में वर्ल्ड रिकॉर्ड है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौत तभी आ सकती है जब ऊपर वाला चाहे।

9. 33,000 फुट की ऊंचाई से गिरी फिर भी जिन्दा

9. 33,000 फुट की ऊंचाई से गिरी फिर भी जिन्दा

यूँ तो 20 फुट की ऊंचाई से गिरने पर ही मौत हो सकती है वहीं वेस्ना ने 33000 फुट की ऊंचाई पर उड़ रहे विमान से गिरने पर भी मौत को मात दे दी। हवाई जहाज में फ्लाइट अटेंडेंट 22 वर्षीय वेस्ना का विमान 1972 में 33000 फुट की ऊंचाई पर ब्लास्ट हो गया था जिसमें सवार अन्य सभी लोगों की आकाश में ही मौत हो गई लेकिन वेस्ना धरती आ गिरी। इस दुर्घटना में उनके के दोनों पैर टूट गए, खाोपड़ी की हड्डी टूट गई, रीढ़ की हड्डी में तीन जगह फ्रे क्चर हो गया। उपचार के दौरान वेस्ना की कमरे के नीचे पूरे हिस्से पर लकवा मार गया लेकिन वो जिंदा बच गई। वेस्ना के नाम दुनिया में सबसे अधिक ऊंचाई वाले फ्रीफाल का रिकॉर्ड है।

10. जिसके हौसले को मौत नहीं तोड़ पाई उसके हौसले को आतंकवादी क्या तोड़ेंगे

10. जिसके हौसले को मौत नहीं तोड़ पाई उसके हौसले को आतंकवादी क्या तोड़ेंगे

इंसान के शरीर के किसी भी हिस्से में गोली लगने से ही मौत हो सकती है, लेकिन पाकिस्तान की मलाला के सिर में गोली लगने के बावजूद ऊपर वाले के चाहे बिना मौत उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाई। 2012 में स्कूल जा रही मलाला के सिर में तालिबानी आतंकियों ने गोली मार दी थी, लेकिन वो बच गई। मलाला लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने की पहल करने वाली एक मुस्लिम लड़की थी जिनकी यह बात तालिबानी आतंकियों को गंवारा नहीं थी जिसके चलते उन्होंने मलाला पर हमला किया।


11. 17 दिन बाद जिंदा निकली मलबे से

11. 17 दिन बाद जिंदा निकली मलबे से

ढ़ाका की एक फेक्ट्री में काम करने वाली रश्मा बेगम भी मौत को मात देने वाली महिलाओं में से एक है। राना प्लाजा नाम की बिल्डिंग में 19 वर्षीय रश्मा समेत हजारों लोग काम करते थे। एक दिन फेक्ट्री की बिल्डिंग गिर गई जिसमें दबकर 1100 लोगों की मौत हो गई। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान 17 दिन बाद मलबा हटता गया तो उसमें से रश्मा बेगम जिंदा निकली जिसे देखकर लोग चौंक गए।

12. 13 महीनों तक तैरता रहा गुमनाम समुद्र में

12. 13 महीनों तक तैरता रहा गुमनाम समुद्र में

सल्वाडोर जनवरी 2014 मार्शल आइसलैंड पर नाव में सवारी करते हुए गुम हो गए थे। जिसके बाद घरवालों ने उन्हें मरा हुआ समझ लिया, लेकिन चमत्कार तब हुआ अब उसके ठीक 13 महीनों बाद वो मौत को समुद्र में ही मात देकर वापस आ गए। सल्वाडोर आइसलैंड पर मछली पकड़ रहे थे लेकिन प्रसांत महासागर में तूफान आने के कारण उनकी नाव दिशा भटक कर प्रसांत महासागर में पहुंच गई और क्षतिग्रस्त भी हो गई। सल्वाडोर इसी टूटी-फूटी नाव पर सवार रहे और 5000 मील का सफर करते हुए जैसे तैसे करके मैक्सिको के तट के पास पहुंचे जहां सल्वाडोर के मछुआरों ने उन्हें देखकर अपने जहाज पर ले लिया। सल्वाडोर ने अपने इस कठिन समय में मछली, पक्षी, कछुए खाने समेत खुद का पेशाब, पक्षियों का खून और बारिश का पानी पीकर जिंदा रखा, लेकिन आखिरकार मौत को मात दे ही दी।

13. आसमान से गिरी मौत मगर ले न पाई ज़िन्दगी

13. आसमान से गिरी मौत मगर ले न पाई ज़िन्दगी

अंतरिक्ष से जब पत्थर धरती पर गिरता है तो उसके आस-पास के मकान तक गिर जाते हैं और ऎसा ही हादसा हॉग्स के साथ भी हुआ, लेकिन वो मरी नहीं। यह घटना 1954 की जब अल्बामा के सिलाकौगा में रहने वाली हॉग्स अपने मकान के जिस कमरे में सो रही थी उसी में आसमान से 4 किलो वजनी पत्थर गिरा। पत्थर के गिरने की गति इतनी तेज थी की घर की छत में छेद होकर वह कमरे में लकड़ी के बॉक्स में रखे रेडियो पर गिरा जो चूर-चूर हो गया। रेडियो हॉग्स बहुत ही कम दूरी पर था। हालांकि इस हादसे में हॉग्स के पेट में चोटें आई लेकिन जैसे-तैसे करके वह टूटे कमरे से बाहर निकल गई और जिंदगी बच गई।

14. सिर के आर पार निकल गया लोहे का सरिया

14. सिर के आर पार निकल गया लोहे का सरिया

यह घटना 13 सितंबर 1848 की की जब रेल्वे में कार्यरत गेग एक छेद में गन पाउडर, फ्यूज और मिट्टी से भर कर लोहे के सरिए से ठोक रहे थे। इसी बीच गन पाउडन में चिंगारी भड़क गई और विस्फोट हो गया। विस्फोट के दौरान लाहे का सरिया गेग की कनपटी से होते हुए सिर के ऊपरी हिस्से से निकल गया और वो खुद भी विस्फोट स्थल से 30 यार्ड की दूरी पर जा गिरे। होश आने पर गेग खुद चलकर अस्पताल गए जहां उनकी खोपड़ी में धंसा सरिया निकाला गया। मौत को मात देने वाले गेग की खोपड़ी के नमूने आज भी बोस्टन के वॉरेन एनाटॉमिकल म्यूजियम में रखे हुए हैं।

15. बर्फ में दफन कार में गुजारे 60 दिन

15. बर्फ में दफन कार में गुजारे 60 दिन

यह घटना स्वीडन के उत्तरी छोर वाले बर्फीले इलाके की है जहां 2012 में दो स्नोमोबाइलर्स ने बर्फ में दबी एक कार देगी। लेकिन जब उन्होंने कार के पास जाकर देखा तो होश उड़ क्योंकि उसमें एक आदमी था। यह आदमी पीटर जो पिछले 60 दिन से उसी में बंद था। बर्फ में दबी कार में पीटर 60 दिन तक कैसे जिंदा रहा है इससे भी साबित होता है कि मौत ऊपर वाले के चाहने पर ही आती अथवा नहीं।

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