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चाचा नेहरू ने की थी ये गलतियाँ, अब तक भुगत रहा है भारत खामियाज़ा

बात चाहे 1962 भारत-चीन युद्ध की हो या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की। आइये जानते हैं पंडित नेहरू की उन गलत नीतियों के बारे में।

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों से जुड़े कई विवाद सामने आ चुके हैं। एक बात जो उस समय के भारत के लिए कही जाती है वह है "उस समय भारत के पास कोई विदेश नीति नहीं थी, परंतु नेहरू के पास थी"। इस बात के काफी गहरे मायने हैं। पंडित नेहरू की कुछ गलत फैसलों का नुकसान भारत को आज भी उठाना पड़ता है।

आइये जानते हैं क्या थी नेहरू की वो नीतियां जिन पर आज इतने वर्षों बाद भी विवाद की स्थिति बनी रहती है।

चाचा नेहरू ने की थी ये गलतियाँ, अब तक भुगत रहा है भारत खामियाज़ा

चाचा नेहरू ने की थी ये गलतियाँ, अब तक भुगत रहा है भारत खामियाज़ा

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  in History

1. कोको आइलैंड द्वीप समूह -

1. कोको आइलैंड द्वीप समूह -

1950 में नेहरू ने भारत का ' कोको द्वीप समूह' बर्मा को गिफ्ट दे दिया। जो कोलकाता से महज 900 किमी दूर बंगाल की खाड़ी में स्थित है। बाद मे बर्मा ने कोको द्वीप समूह चीन को दे दिया, जहाँ से आज चीन द्वारा भारत पर निगरानी रखने का काम किया जाता है।

2. काबू घाटी, मणिपुर -

2. काबू घाटी, मणिपुर -

पंडित नेहरू ने 13 जनवरी 1954 को भारत के मणिपुर प्रांत की काबू घाटी दोस्ती के तौर पर बर्मा को दे दी। काबू घाटी लगभग 11000 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली हुई है और कहा जाता है कि इस घाटी की खूबसूरती कश्मीर से भी अधिक है। आज बर्मा नें काबू घाटी का कुछ हिस्सा चीन को दे रखा है।

3. भारत-नेपाल विलय -

3. भारत-नेपाल विलय -

1952 मे नेपाल के तत्कालीन राजा त्रिभुवन विक्रम शाह ने नेपाल को भारत मे विलय कर लेने की बात पंडित नेहरू से कही, लेकिन पंडित नेहरू ने यह कहकर उनकी बात टाल दी थी कि नेपाल का भारत में विलय होने से दोनों देशों को फायदे की जगह नुकसान होगा एवं नेपाल के पर्यटन में भी इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा।

4. जवाहरलाल नेहरू व लेडी माउंटबेटन -

4. जवाहरलाल नेहरू व लेडी माउंटबेटन -

लेडी माउंटबेटन की बेटी पामेला ने अपनी एक किताब में लिखा है कि दोनों के बीच गहरे संबंध थे। लॉर्ड माउंटबेटन भी दोनों के रिश्ते से वाकिफ थे। ऐसा कहा जाता है कि इस नीति के जरिये लार्ड माउंटबेटन नें पंडित नेहरू से भारत की सैन्य व आर्थिक नीतियों से जुड़े कई राज़ निकलवाएं हैं।

5. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थाई सदस्यता ठुकराना -

5. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थाई सदस्यता ठुकराना -

नेहरू ने 1953 में अमेरिका की उस पेशकश को ठुकरा दिया था, जिसमें भारत को संयुक्त  स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया था। इसकी जगह नेहरू ने चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की सलाह दी थी। आज भी इस बात का खामियाज़ा भारत को भुगतना पड़ता है।

6. पंचशील समझौता -

6. पंचशील समझौता -

नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। नेहरू ने 1954 को चीन के साथ पंचशील समझौता किया था। इस समझौते के साथ ही भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया। नेहरू ने चीन से दोस्ती के लिए तिब्बत को भरोसे में लिए बिना उस पर चीन के 'कब्जे' को मंजूरी दे दी। 1962 में जब भारत-चीन युद्ध हुआ तो चीनी सेना इसी तिब्बत के मार्ग से भारत के अंदर तक घुस आई थी।

7. वी के कृष्ण मेनन को रक्षा विभाग सौंपना -

7. वी के कृष्ण मेनन को रक्षा विभाग सौंपना -

जवाहरलाल नेहरू नें 1957 में भारतीय रक्षा विभाग वी के कृष्ण मेनन के हवाले कर दिया था। मेनन को ऐसे संवेदनशील विभाग को संभालने का कोई अनुभव नहीं था। परंतु मेनन की नेहरू से नजदीकियों की वजह से कई उपयुक्त नामों को नजरअंदाज कर मेनन को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मेनन नें रक्षा विभाग में आते ही हथियार की खरीद को रोक दिया एवम कई सैनिकों को सेवानिवृत्ति दे दी। उनका मानना था कि पाक व चीन भारत पर हमला नहीं करेंगे। 1962 में भारत की हार की यह एक बड़ी वजह साबित हुई थी।

8. भारत-चीन युद्ध 1962 -

8. भारत-चीन युद्ध 1962 -

नेहरू की नीतियों की वजह से भारत को 1962 में चीन से हार झेलनी पड़ी थी। हार के कारणों को जानने के लिए भारत सरकार ने ले.जनरल हेंडरसन और कमांडेंट ब्रिगेडियर भगत के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी। दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में हार के लिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया था। चीनी सेना अरूणाचल प्रदेश, असम एवं सिक्किम तक अंदर घुस चुकी थी। इसके बावजूद भी नेहरु ने हिंदी-चीनी भाई-भाई कहते हुए भारतीय सेना को चीन के खिलाफ मोर्चा खोलने से रोके रखा। परिणाम स्वरूप हमारे कश्मीर का लगभग 14000 वर्ग किमी भाग पर आज चीन का कब्ज़ा है। जिसमे  कैलाश पर्वत, मानसरोवर और अन्य तीर्थ स्थान भी शामिल हैं।

9. कश्मीर मुद्दा -

9. कश्मीर मुद्दा -

नेहरू नें धर्मनिरपेक्षता का चोगा कुछ इस तरह पहना हुआ था कि उन्हें कश्मीर का मुद्दा दिखाई ही ना दिया। जब 1947 से 1965 के दरमियान कश्मीरी घाटी से कश्मीर के पंडितों को निकाला जा रहा था। उनके साथ बलात्कार व हत्याएं हो रही थी तब भी वो मौन रहे। भारत की तरफ से उन्हें पुनर्विस्थापन की अनुमति या सुविधा भी नहीं मिली। इसे वैश्विक स्तर में भारत की नीतिगत हार के रूप में देखा गया।

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